आर्टिकल

Late Arjun Singh - in the eyes of a physician.

I happened to see Late Arjun Singh when he was convalescing in a hotel following Heart bypass surgery. I was told that he is in a miserable condition, spending days & nights sitting in bed. When examined he was in advanced cardiac failure with fluid collected in the lung & pleura. Oxygen, Pleural aspiration, IV diuretic & strict control of salt & water was instituted. He improved and could sleep flat with one pillow. He profusely thanked me and asked me to supervise his treatment. A year later he wanted to have further consultation in United States. I accompanied him to Philadelphia where he was admitted in a cardiac hospital for seven days. A day before discharge, he was interviewed by the Professor of Cardiology and told that this hospital has nothing new to offer. You are in safe hands with Dr Shahi and continue your treatment. While coming back to the hotel, he told me what was the use of coming to coming to USA?. I said that if diagnosis is correct, the treatment doesn’t vary in any hospital. A year later he had fainting attacks and I implanted dual chamber pacemaker. He led a normal life subsequently and attended to his official work as HRD minister.Late Arjun Singh was a voracious reader of history and political science. I accompanied him to UK, France and Germany. While driving through Main Avenue of Paris, he asked the Driver to stop near a small coffee house. he told me that this coffee house was the centre of French revolution. In United States also, he visited Valley Forge the centre of American civil war. Late Arjun Singh had a vision for India, where people of all caste, communities and religion work together, peacefully for progress and development of India. 

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स्व. अर्जुन सिंह जी: स्मृतियाँ, प्रेरणा और आत्मीय संबंध

श्रद्धेय स्व.अर्जुन सिंह जी स्वतंत्र भारत के उन चुनिंदा अग्रणी जनप्रतिनिधियों में एक हैं जिनकी बुद्धि, बुद्धिमत्ता, दूरदृष्टि, मानवीयता और सम्वेदना की सानी बहुत कम मिलती है lउनकी स्मृति, योजनाओं और कार्यशैली को संग्रहित कर भावी पीढियों के मार्गदर्शन के लिये सुरक्षित रखने की पहल सद्भावना फाउंडेशन की स्थापना है lअर्जुन सिंह जी की पुत्री, मेरी बहन, वीना फाउंडेशन की अध्यक्ष हैं और उन्होंने मुझे एक सदस्य के रूप में जुड़ने का सौभाग्य दिया है lमेरे लिए अर्जुन सिंह जी एक अतिविशिष्ट नेता ही नहीं थे मेरे लिए वह  ' अर्जुन अंकल ' थे lहमारे परिवारों में दो पुस्त की दोस्ती और अब तीसरी पीढ़ी में भी वही नजदीकियों चली आ रही हैं ।मेरे लिए उस अनुभव को एक लेख में व्यक्त करना असंभव है l मैंने जब से होश संभाला उनकी बेटी वीणा निरंतर पिछले 60 वर्षों से पूर्ण अपनत्व से मेरी राखी बहन रही हैं और मुझ से नियमित रूप से हर साल राखी का बंधन निभाया lवीणा संस्था की अध्यक्ष ही नहीं बल्कि पूरी जिम्मेदारी से अपने काम को करने के साथ-साथ हम सबको भी अपनी अपनी जिम्मेदारियां का हर समय आभास कराती हैं ।मुझे अर्जुन अंकल के लिए इन शब्दों में व्यक्त करना उचित रहेगा - वह मेरे परिवार के एक सदस्य के रूप में थे और मेरे पिता के सहपाठी और मेरी मां को अर्जुन आंटी दीदी बोलती थी lइन्हीं रिश्तों से सब व्यक्त हो जाता है कि मेरे लिए वह क्या थे और हमेशा क्या रहेंगे ।जब मैने कॉलेज पास करके अपना व्यापार शुरू किया तो उन्होंने मुझे हमेशा प्रोत्साहित करके यही कहा कि जो भी तुम करते हो उसमें गरीबों की भलाई के लिए भी एक अंश रखना और हमेशा सोचना lउनकी यह सीख  मेरे लिए एक सेवा भावना की नींव बन गई। मैंने अपने पूरे सामन्य और राजनीतिक जीवन में हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि मैं जरूरतमंदों की सेवा हर समय हर तरीके से करने की कोशिश करते रहूँ  lमैंने पिछले 59 वर्ष के राजनीतिक जीवन में उनकी हर बात को ग्रहण करने की कोशिश करी और समय समय पर उनसे मार्गदर्शन भी लिया।मेरे लिए वे जन नेता से बढ़कर थे l उनकी दूरदर्शिता और चाणक्यनीति हर परिस्थिति में देश सेवा के काम आयी। उनका पूरा व्यक्तित्व ही गरीबों के मसीहा और धर्मनिरपेक्षता के आधार पर टीका था।  उन्होंने अपने  संपूर्ण जीवन को देश सेवा में लगा दिया।आज देश के एक महान सपूत और मेरे निजी परिवर के बड़े को नमन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है l

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सौभाग्य की मूलक : अर्जुन सिंह जी के साथ मेरे संस्मरण

 आम मान्यता है कि कुशल राजनीतिज्ञ भावना नहीं, योजना में यकीन रखते हैं पर मैंने अर्जुन सिंह को मुझे अपनी स्नेहिल छाया देते पाया। इस बिन्दु को विस्तार देने के लिये एक स्मृति पर्याप्त होगी। एनसीईआरटी लगातार विवादों और सुर्खियों से जूझती रहती थी। इसलिये मुझे चौकन्ना बने रहने और रोजाना किसी नई मुसीबत से गुज़रने की आदत हो गई थी। फिर भी जब तीसरे साल में हिन्दी की नई पुस्तकों पर संसद में हुए हंगामे की खबर आई तो मैं हैरान और काफी परेशान हो गया। संदेश आया कि शाम को मंत्री जी ने घर पर मिलने को कहा है। अगले दिन संसद में दोबारा चर्चा होनी थी। मैं घर पहुंचा तो रोज की तरह दर्जनों लोग इंतजार कर रहे थे। आठ बजे मुझे अंदर वाले कमरे में बुलाया गया। वहाँ भी दो-चार लोग पहले से बैठे थे। कुछ देर में अर्जुन सिंह अंदर आए और दरवाजे में एक क्षण खड़े होकर मेरी तरफ देखकर अंग्रेजी में बोले -"सो यू आर अगेन इन ट्रबल" उनके होठों पर क्षीण सी मुस्कान थी- फिक्र मत करो हम संभाल लेंगे। अगले दिन राज्य सभा में पाठ्यपुस्तकों की चर्चा की बारी आते आते रात के दस बज चुके थे। दिन भर बैठे-बैठे यह अहसास मेरे मन में गहराता गया था कि शिक्षा के किसी भी पहलू पर शांति से बहस करना संसद के बस की बात नहीं है। जिन रचनाओं पर आपत्ति उठाई गई थी वे प्रेमचन्द, धूमिल, पाण्डेय, बेचन शर्मा "उग्र", जगदीश चंद्र माथुर, पांश और ओमप्रकाश वाल्मीकी कि जैसे साहित्यकारों की थी। चित्रकार हुसैन की जीवनी पर भी आपत्ति थी। कुछ रचनाओं पर उठाई गई आपत्तियाँ चंद पंक्तियों या शब्दों को लेकर थी मानो साहित्य में संदर्भ और अर्थ या व्यंजना का कोई महत्व न हो। मेरे सहयोगी रामजन्म शर्मा ने एक एक आपत्ति का उत्तर तैयार किया था, पर मेरे मन में पूरी चर्चा की शैली से उठा गुबार शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। चर्चा क्या थी एक अंधड़ था जिसमें बड़े-बड़े नेता आधी-अधूरी जानकारी और समय के आधार पर जो मर्जी कह चुके थे। वामपंथी नेता सीताराम येचुरी ने आवेश में कहा था- गुनहगारों को सजा मिलनी चाहिये। लंबी इंतजार के बाद रात दस बजे के बाद जब उत्तर देने के लिये अर्जुन सिंह खड़े हुए तो वे एक धैर्त्यवान, शांत योद्धा जैसे लग रहे थे। सदस्यगण जोर डाल रहे थे कि हिन्दी की पुस्तकों की जाँच एक संयुक्त संसदीय समिति करें। अर्जुन सिंह काफी देर तक एक एक आपत्ति का उत्तर देते रहे एक-दो बार उन्होंने संयत व्यंग्य का सहारा भी लिया। अंत में अपनी वरिष्ठता की गरिमा के साथ निर्णायक स्वर में बोले कि संयुक्त संसदीय समिति की कोई आवश्यकता नहीं है; वे स्वयं एक जाँच समिति बनाएंगे। सभा चुप रही। आधी रात होने को थी। मैं उनका यह शांत दृढ़ रूप पहले भी कई बार देख चुका था। एनसीईआरटी में मेरे शुरूआतीमहीने में कार्यकारिणी की बैठक हुई थी। अभी नई पाठ्यचर्या और पाठ्यपुस्तकों की रचना का काम काफी दूर था और इतिहास की किताबों पर आक्रमणों का सिलसिला जारी था। कार्यकारिणी की बैठक के ठीक बाद साधारण सभा की बैठक में की चर्चा करते हुए भाजपा शासित राज्यों के शिक्षामंत्री इतिहास की पुस्तकें दोबारा लाए जाने की संभावना के विरोध में बाहर चले गए। इस बीच अर्जुन सिंह ने रामजन्म शर्मा को इशारा करके उन्हें कोई सूचना लाने को भेजा। सभा के समापन से पहले वह सूचना आ चुकी थी। अपने समापन वक्तव्य में तुलसी दास की यह चौपाई संख्या और संदर्भ देकर सुनाई "भये प्रगट कृपाला दीन दयाला, कौशल्या अधिकारी"। चौपाई सर्वपरिचित थी पर अर्जुन सिंह ने उसकी व्याख्या करके सबको चौका दिया। प्रगट का अर्थ समझाते हुए वे बोले कि राम के जन्म को किसी खास जगह से जोड़ने वाले उनके अलौकिक रूप को नकारते हैं अर्थात् भगवान राम प्रगट हुए थे किसी सामान्य शिशु की तरह नहीं जन्मे थे।कुछ समय बाद जब नई राष्ट्रीय पाठ्यचर्या बनाने की तैयारी शुरू हुई तो यह अफवाह फैली कि मैं अपना प्रत्येक निर्णय मंत्री जी के इशारे पर ले रहा हूँ। एक विशद प्रक्रिया के तहत हर विषय के अग्रणी विद्वान पाठ्यचर्या के निर्माण में उत्साह से अपना समय लगा रहे थे, फिर भी अफवाह जारी रही। मंत्रालय की सिफारिश पाने के इच्छुक लगातार दबाव बनाने की कोशिश करते रहे। एनसीईआरटी के कामकाज में योगदान देने के इच्छुकों या किसी खाली पद पर नियुक्ति के उम्मीदवारों ने सिफारिश प्राप्त करने के लिये क्या नहीं किया होगा, इसकी कल्पना मैं कर सकता हूँ। ऐसो ही एक दिन मेरे आफिस में फोन कराके एक सज्जन स्वयं आ पहुंचे। वे मिलने की प्रतीक्षा कर रहे थे कि बीच स्वयं अर्जुन सिंह का फोन आया कि ये सज्जन गुहारो मिलना चाहते थे, अतः मैं मिल लूँ उनकी बात सुन लूँ, यही काफी हो है। इस सच्चाई को आज भी कोई मानने को राज़ी नहीं है, कि मेरे पाँच वर्ष के कार्यकाल में एक बार भी अर्जुन सिंह ने मेरे काम या मेरी संस्था में किसी भी किसम का हस्तक्षेप नहीं किया न कभी कोई राय दी, दबाव का तो सवाल ही नहीं था। जैसा उन्होंने गुहारो पहले दिन कहा था वही अंत तक राज बना रहा : "एन एनसीईआरटी जिन उद्देश्यों के लिये बनी थीं उन्हें पूरा कीजिए।"एक बार भोपाल के रीजनल इन्स्टीगूट में काम कर चुका चपरासी दिल्ली पहुँचा। वह मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी से अपनी गुहार की अनुशंसा लेकर अर्जुन सिंह के पास आया था। उसका दावा था कि कुछ वर्ष पहले रीजनल इन्स्टीगूट ने उसके साथ अन्याय किया था। उसकी द्वारा शिकायत की जाँच एकदो बार हो चुकी थी पर अन्याय का कोई पगता नहीं मिला था। अबकी बार वह सीधे मंत्री जी के पास जा पहुंचा था। मंत्रालय ने एनसीईआरटी के सचिव (जो सत्य आई.ए.एस से संयुक्त सचिव के पद पर थे) को फोन किया था जोकि वे सारी फाइलें लेकर मंत्री जी के कार्यालय पहुंचे। मुझे साथ में आने के लिये संदेश आया। हम दोनों नियत समय पर अर्जुन सिंह के कार्यालय में दाखिल हुए तो देखा कि चपरासी पहले से वहाँ मौजूद था। उसके सामने अर्जुन सिंह ने पूछा कि क्या पिछली जाँच के सारे कागज़ ठीक से देख लिये गये हैं। मेरे साथ आए सचिव ने फाइलें दिखा कर कहा कि आज ही उन्होंने पूरे कागज़ जांचे हैं और कहीं कोई कमी नहीं पाई है। एक दो मिनट बाद अर्जुन सिंह ने कहा-"ठीक है आप लोग जाइये।" चपरासी भी मेरे साथ बाहर आ गया। मेरे सचिव कुछ उलझन में थे अतः दोबारा अंदर गये और मंत्री जी से बोले-" सर कुछ करना है?" जवाब मिला- "नहीं।" फिर थोड़ी देर रुककर बोले- यदि आप उसकी जगह होते तो आप भी यही करते।अर्जुन सिंह की प्रशासनिक शैली निराली थी। बहुत कम शब्दों में बहुत सोचकर अपनी बात कहते थे। घंटों तक धीरज के साथ सबकी बातें सुनकर अंत में कुछ कहते थे- सधे नपे तुले मगर महत्वपूर्ण विवरणों के साथ। मैंने कई बार उनके वैचारिक अन्तरजगत की गहराई का व्यक्तिगत अनुभव किया। प्रोफेसर यशपाल जो चोटी के अन्तरिक्ष वैज्ञानिक थे और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रचना के मार्गदर्शक थे कई बार मुझसे कहते थे कि अर्जुन सिंह जैसे नेता उन्होंने बहुतै कम देखे हैं। बुद्धिजीवियों, कलाकारों, साहित्यकारों और विद्वानों के संग बातचीत में अर्जुन सिंह की सहृदय जिज्ञासा सहज दिखाई देती थी। राजनीति के बीहड़ में वे कई बार अकेले दिखलाई देते थे। मेरा सौभाग्य ही था कि मुझे अनायास उनका स्नेहिल संरक्षण एक कठिन प्रशासनिक जिम्मेदारी को निभाते समय मिला।

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अर्जुन सिंह : विजय दत्त श्रीधर साक्षात्कार (संवाद रूप)

 साक्षात्कारकर्ता: नमस्कार। हम बात करने जा रहे हैं कीर्तिशेष भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्री अर्जुन सिंह जी के बारे में। अर्जुन सिंह जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी रहे और हम उनके बारे में चर्चा करने जा रहे हैं ऐसे व्यक्तित्व से, जो किसी परिचय का मोहताज नहीं है। जी हाँ, आप समझ गए होंगे। हम बात कर रहे हैं सप्रे संग्रहालय के संस्थापक श्री विजय दत्त श्रीधर जी से।तो विजय श्रीधर जी, आपका स्वागत है।विजय दत्त श्रीधर: जी, नमस्कार।साक्षात्कारकर्ता: जी, सबसे पहले हम जानना चाहेंगे कि आपकी अर्जुन सिंह जी से पहली निकटता कैसे और कब हुई?विजय दत्त श्रीधर: 1980 में, बल्कि उससे थोड़ा पहले, तब अर्जुन सिंह जी विपक्ष के नेता थे। उस समय हम लोग मध्य प्रदेश आंचलिक पत्रकार संघ चलाते थे। उसी के बैनर तले पत्रकारों और प्रशासन के बीच एक बड़ा ऐतिहासिक संघर्ष हुआ। यह घटना छतरपुर की है और पत्रकारिता के इतिहास में इसे एक मील के पत्थर के रूप में याद किया जाता है।छतरपुर में एक पुलिस अधिकारी ने परीक्षा देने आई एक बच्ची के साथ बलात्कार किया था। पुलिस ने मामले को दबाने की कोशिश की। जनता में भारी आक्रोश था। लोग सड़कों पर उतर आए और पत्रकारों ने पीड़ित बच्ची का साथ दिया। वे न्याय के पक्ष में खड़े हो गए।इससे कलेक्टर और पूरा प्रशासन बेहद नाराज़ हो गया। एक जाँच रिपोर्ट तैयार हुई। एस.डी.एम. ने जाँच करवाई, लेकिन रिपोर्ट आने के बाद कलेक्टर साहब उसे दबाकर बैठ गए। पत्रकारों ने किसी तरह वह रिपोर्ट प्राप्त की और उसका प्रकाशन 'शुभ भारत', 'क्रांति' तथा अन्य स्थानीय समाचार पत्रों में किया।बस, फिर क्या था। कलेक्टर साहब सातवें आसमान पर पहुँच गए। पत्रकारों को अपराधी की तरह देखा जाने लगा।जब यह सब हुआ तो हमारे एक वरिष्ठ सहयोगी भूषण देव सागर जी थे। वे कांग्रेस के बड़े नेता थे और पेशे से वकील भी थे। हमने उनसे पूछा—"भाई, वहाँ बच्चों का कलेक्टर से संघर्ष हो गया है। अब क्या करना चाहिए?"उन्होंने साफ कहा—"भोपाल में बैठकर मुख्यमंत्री से लड़ा जा सकता है। दिल्ली में बैठकर प्रधानमंत्री से भी लड़ा जा सकता है। लेकिन किसी ज़िले में कलेक्टर से लड़ना बहुत कठिन होता है। पटवारी और थानेदार से भी लड़ना आसान नहीं होता। यदि ये बच्चे संघर्ष कर रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि वे सच के लिए खड़े हैं।"इसके बाद हमारी मुलाकात अर्जुन सिंह जी से हुई। तब वे मुख्यमंत्री बन चुके थे।विजय दत्त श्रीधर: तब विधानसभा में कपूर भोवरा जी, जो उस समय कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक थे (बाद में वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए), तथा बट जी ने विधानसभा में इस पूरे मामले को बहुत तल्ख़ी और गंभीरता के साथ उठाया। अंततः मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह जी ने घोषणा कर दी कि इस मामले की न्यायिक जाँच कराई जाएगी।हिन्दुस्तान के इतिहास में किसी ज़िला मजिस्ट्रेट (कलेक्टर) के विरुद्ध पत्रकारिता की स्वतंत्रता के प्रश्न पर यह पहली न्यायिक जाँच थी। उस समय के ज़िला न्यायाधीश ने जाँच की।जाँच के दौरान प्रशासन की ओर से यह आरोप लगाया गया कि पत्रकार ब्लैकमेलर हैं, लेकिन एक भी आरोप सिद्ध नहीं हो सका। इससे यह स्पष्ट हो गया कि पत्रकार अपने दायित्व का निर्वहन कर रहे थे।असल समस्या यह थी कि कलेक्टर को कानून की पूरी जानकारी नहीं थी। उन्हें यह भी समझ नहीं थी कि किसी ज़िले में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और संबंधित पक्षों के साथ व्यवहार करते समय एक कलेक्टर का दृष्टिकोण और आचरण कैसा होना चाहिए।अंततः उनके सी.आर. (Confidential Report) में भी इस मामले का उल्लेख दर्ज हुआ।बाद में जब अर्जुन सिंह जी से इस विषय पर चर्चा हुई तो उन्होंने मुझसे कहा—"पंडित जी, आप मुझे सीधे बता देते, तो जैसा आप चाहते थे वैसा कर देता।"मैंने उनसे कहा—"डॉक्टर साहब, आप तो वह कर ही रहे थे, लेकिन उससे कोई नज़ीर नहीं बनती। आज पूरे हिन्दुस्तान में यह एक मिसाल बन गई कि प्रेस के साथ प्रशासन का व्यवहार कैसा होना चाहिए।"आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हम उन्हें इस बात के लिए विशेष रूप से याद करते हैं कि उन्होंने तत्कालीन मुख्य सचिव के हस्ताक्षर से एक परिपत्र (Circular) जारी करवाया।उसमें स्पष्ट निर्देश दिए गए कि यदि कहीं पत्रकारों से जुड़ा कोई विवाद सामने आए, तो पहले जनसंपर्क विभाग के माध्यम से पूरे मामले के तथ्य, परिस्थितियाँ और प्रमाण एकत्र किए जाएँ। उसके बाद ही कोई प्रशासनिक कार्रवाई की जाए।इस निर्णय का बहुत दूरगामी प्रभाव पड़ा। पूरे देश में प्रशासन और पत्रकारों के संबंधों को लेकर एक सकारात्मक उदाहरण स्थापित हुआ।इसी कारण हमारे मन में अर्जुन सिंह जी के प्रति हमेशा एक विशेष सम्मान और आत्मीयता बनी रही।साक्षात्कारकर्ता: जी, तो इस घटना के बाद आपकी उनसे निकटता बढ़ी। हम जानना चाहेंगे कि राजनीति से परे, एक व्यक्ति के रूप में श्री अर्जुन सिंह जी के बारे में आपकी पहली छवि क्या रही?विजय दत्त श्रीधर: अर्जुन सिंह जी से उस घटना के बाद हमारा संवाद लगातार बढ़ता गया। सबसे पहले हमने 'आंचलिक पत्रकार' नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया। उससे पहले गाँवों में कार्य करने वाले संवाददाताओं के लिए एक छोटी-सी गाइड बुक भी तैयार की थी, क्योंकि उस समय पत्रकारिता का कोई व्यवस्थित प्रशिक्षण उपलब्ध नहीं था।उस गाइड बुक का विमोचन कराने के लिए हमने अर्जुन सिंह जी को आमंत्रित किया। उन्होंने उसका विमोचन किया। उसके बाद हमारा संवाद और अधिक गहरा होता गया।उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे बोलते कम थे और सुनते अधिक थे। और जब बोलते थे, तो बहुत संक्षेप में, सूत्र रूप में अपनी बात रखते थे।सन् 1983 में मुझे मध्य प्रदेश ग्रंथ अकादमी की ओर से 'मध्य प्रदेश में पत्रकारिता का इतिहास' पुस्तक तैयार करने का कार्य मिला। तीन-चार साथियों के सहयोग से वह कार्य पूरा हुआ। उस पुस्तक का विमोचन भी अर्जुन सिंह जी ने ही किया।उस पुस्तक के संपादन के सिलसिले में हमें पूरे प्रदेश का भ्रमण करना पड़ा। तब हमें यह अनुभव हुआ कि पत्रकारिता और इतिहास से संबंधित अधिकांश सामग्री न तो किसी पुस्तकालय में उपलब्ध थी और न ही किसी सरकारी अभिलेखागार में। विश्वविद्यालयों में भी उसका समुचित संग्रह नहीं था।यह सामग्री ऐसे लोगों के निजी संग्रहों में सुरक्षित थी, जिन्हें हम विद्यानुरागी या विद्याव्यसनी कह सकते हैं। ऐसे लोग, जो बिना पढ़े रह नहीं सकते थे और जीवन भर दुर्लभ सामग्री एकत्रित कर उसे सुरक्षित रखते रहे।उनके संग्रहों में हमें अत्यंत महत्वपूर्ण सामग्री मिली, लेकिन साथ ही यह चिंता भी हुई कि यदि समय रहते उसे सुरक्षित नहीं किया गया, तो वह हमेशा के लिए नष्ट हो जाएगी। पुराने समाचार-पत्रों के पन्ने इतने जर्जर हो चुके थे कि उन्हें हाथ लगाते ही वे टूटने लगते थे।हमें लगा कि यदि यह सामग्री नष्ट हो गई, तो इतिहास के अनेक महत्वपूर्ण प्रमाण भी समाप्त हो जाएँगे। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन, समाज सुधार आंदोलनों, स्वदेशी आंदोलन, शिक्षा के प्रसार और अनेक ऐतिहासिक घटनाओं का वास्तविक दस्तावेज़ी इतिहास इन्हीं समाचार-पत्रों में सुरक्षित था।जबलपुर में रामेश्वर गुरु जी जैसे विद्वानों के पास दो-दो कमरों में दुर्लभ सामग्री संग्रहित थी। लेकिन यह भी चिंता थी कि आने वाली पीढ़ियाँ शायद उस सामग्री को उसी प्रकार सुरक्षित न रख सकें।तब विचार आया कि इस समस्त सामग्री को एक ही छत के नीचे सुरक्षित रखा जाए। उसकी पहली शर्त सुरक्षा हो और दूसरी शर्त यह कि शोधार्थियों को वहीं बैठकर अध्ययन करने की सुविधा मिले, ताकि सामग्री सुरक्षित भी रहे और शोध के लिए उपलब्ध भी हो।इसी विचार के साथ हम भोपाल लौटे। हमारे मित्र बी.आर. यादव जी, जो पहले नवभारत, बिलासपुर के मुख्य संवाददाता रहे थे, उनके माध्यम से हमारी मुलाकात पुनः अर्जुन सिंह जी से हुई।हमने विस्तार से पूरी योजना उनके सामने रखी। वे लगभग पंद्रह मिनट तक अत्यंत ध्यान से हमारी बातें सुनते रहे। बीच-बीच में केवल इतना कहते—"अच्छा..."उनकी यही शैली थी। वे पहले पूरी बात सुनते थे, फिर निर्णय लेते थे।जब हम बाहर निकले तो मैंने यादव जी से कहा—"उन्होंने विचार तो ध्यान से सुना, लेकिन कुछ कहा नहीं। अब आगे क्या होगा?"शाम लगभग पाँच बजे से पहले ही सूचना विभाग के संचालक का फोन आया। उन्होंने कहा—"श्रीधर जी, आपकी योजना मुख्यमंत्री जी को बहुत पसंद आई है। उन्होंने कहा है कि इस पर तुरंत आगे बढ़िए।"तब हमें विश्वास हुआ कि वे केवल सुन नहीं रहे थे, बल्कि मन ही मन निर्णय भी ले चुके थे।आगे चलकर इसी विचार ने सप्रे संग्रहालय की स्थापना का रूप लिया।19 जून 1984 को भोपाल के पुराने कमला पार्क परिसर में स्थित एक छोटे-से भवन से सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान की स्थापना हुई। प्रारंभ में वही छोटा-सा स्थान इस कार्य के लिए उपलब्ध कराया गया था, जिसे व्यवस्थित कर संग्रहालय का कार्य आरंभ किया गया।बाद में एक अवसर पर अर्जुन सिंह जी ने मुझसे पूछा—"सप्रे जी के बारे में विस्तार से बताइए।"मैंने कहा—माधवराव सप्रे वे व्यक्तित्व थे जिन्होंने हिन्दी में अर्थशास्त्र की शब्दावली तैयार की। उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को संस्कार प्रदान किए। हिन्दी की पहली मौलिक कहानी "एक टोकरी भर मिट्टी" लिखने का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है।जब नागरी प्रचारिणी सभा, काशी ने हिन्दी विश्वकोश तैयार करने की योजना बनाई, तब उसके एक महत्वपूर्ण खंड की जिम्मेदारी माधवराव सप्रे को सौंपी गई। उस समय वे केवल स्नातक थे।सरकारी नौकरी के रूप में उन्हें एक्स्ट्रा असिस्टेंट कमिश्नर (डिप्टी कलेक्टर) बनने का अवसर भी मिला, लेकिन उन्होंने सरकारी सेवा स्वीकार नहीं की। उन्होंने पत्रकारिता को अपना जीवन-कार्य बनाया और पेंड्रा रोड से "छत्तीसगढ़ मित्र" नामक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया।उनका एक और बड़ा गुण था—वे प्रतिभाशाली युवाओं को पहचान लेते थे और उनका मार्गदर्शन करते थे।ऐसे ही एक युवा थे पंडित माखनलाल चतुर्वेदी।उस समय वे एक सरकारी विद्यालय में अध्यापक थे। स्वदेशी आंदोलन पर लिखे उनके एक निबंध को प्रथम पुरस्कार मिला। वह निबंध जब माधवराव सप्रे की दृष्टि में आया तो उन्होंने तुरंत उनकी प्रतिभा को पहचान लिया।उन्होंने माखनलाल जी को पत्र लिखकर कहा—"तुम्हारा जन्म सरकारी नौकरी करने के लिए नहीं हुआ है। तुम्हारा जन्म राष्ट्रीय कार्य के लिए हुआ है।"इसी प्रेरणा के बाद माखनलाल चतुर्वेदी ने अध्यापक पद से त्यागपत्र दिया।सन् 1913 में वे 'प्रभा' पत्रिका के संपादक बने। बाद में 17 जनवरी 1920 को जब 'कर्मवीर' का प्रकाशन प्रारंभ हुआ, तब उसके संपादक भी बने।आगे चलकर वे हिन्दी साहित्य, राष्ट्रीय पत्रकारिता और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख सेनानियों में गिने गए। वे मध्य प्रांत में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के प्रथम सत्याग्रही भी रहे।अर्जुन सिंह जी अत्यंत ध्यानपूर्वक मेरी पूरी बात सुनते रहे।जब मैंने यह सब बताया तो उन्होंने कहा—"अच्छा... तो सप्रे जी इतने बड़े व्यक्तित्व थे। आपने उनका बहुत यथोचित परिचय कराया।"उनकी यही विशेषता थी। वे किसी विषय को केवल औपचारिक रूप से नहीं सुनते थे, बल्कि उसकी आत्मा तक पहुँचने का प्रयास करते थे।हमारे और उनके संबंध केवल मुख्यमंत्री और पत्रकार के नहीं थे। उन संबंधों की बुनियाद विचार, अध्ययन और सांस्कृतिक सरोकारों पर टिकी हुई थी।साक्षात्कारकर्ता: जी, जानना चाहेंगे कि महत्वपूर्ण निर्णयों के समय श्री अर्जुन सिंह अपने सहयोगियों और सलाहकारों पर कितना भरोसा करते थे?विजय दत्त श्रीधर: वे अपने सहयोगियों पर पूरा विश्वास करते थे, इसलिए उनसे सलाह भी लेते थे।अर्जुन सिंह जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय से पहले अपने सभी सहयोगियों की राय ध्यान से सुनते थे। आज जिसे कोर टीम कहा जाता है, उस प्रकार की बैठकों में वे स्वयं पहले अपना मत व्यक्त नहीं करते थे।वे सभी लोगों की राय बड़े सम्मान के साथ सुनते थे और उसके बाद अपने विवेक से निर्णय लेते थे। उनका निर्णय ऐसा होता था, जिसमें सभी के विचारों का कहीं न कहीं समावेश दिखाई देता था।उदाहरण के लिए झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों को पट्टे देकर उन्हें मालिकाना हक़ दिलाने का निर्णय हो या रिक्शा चालकों को उनके रिक्शों का स्वामित्व दिलाने का निर्णय—ये सब उनके सामाजिक दृष्टिकोण के उदाहरण थे।उस समय अधिकांश रिक्शा चालक किराये पर रिक्शा चलाते थे। वे दिन-भर मेहनत करते थे, लेकिन रिक्शा उनका अपना नहीं होता था। अर्जुन सिंह जी ने ऐसी व्यवस्था बनाई कि उन्हें स्वयं अपने रिक्शे का मालिक बनने का अवसर मिले।इसी प्रकार तेंदूपत्ता के राष्ट्रीयकरण का निर्णय भी अत्यंत महत्वपूर्ण था।तेंदूपत्ता जंगलों में स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होता है। आदिवासी और वनवासी उसे एकत्र करते थे, लेकिन उसका सबसे अधिक लाभ व्यापारियों को मिलता था। मजदूरों को बहुत कम पारिश्रमिक प्राप्त होता था।अर्जुन सिंह जी ने तेंदूपत्ता का राष्ट्रीयकरण किया। इसके बाद तेंदूपत्ता संग्राहकों को बेहतर मजदूरी मिलने लगी। उन्हें बोनस भी मिलने लगा। इससे आदिवासी और वनवासी परिवारों की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ।उनकी दृष्टि हमेशा समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने की थी।चाहे पट्टों का वितरण हो, रिक्शा चालकों को स्वामित्व दिलाना हो या तेंदूपत्ता संग्राहकों के अधिकारों की रक्षा—इन सभी निर्णयों के पीछे उनका उद्देश्य केवल एक था—समाज के उस अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुँचना, जो सबसे अधिक वंचित है।महात्मा गांधी भी यही कहते थे कि जब समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के जीवन में खुशहाली आएगी, तभी वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ पूरा होगा।मुझे लगता है कि अर्जुन सिंह जी उसी विचारधारा पर चलने वाले राजनेता थे।साक्षात्कारकर्ता: तो आपसे हुई चर्चा से जुड़ा मेरा एक और प्रश्न है। औद्योगिक विकास और आदिवासी अधिकारों के बीच उन्होंने संतुलन किस प्रकार स्थापित किया?विजय दत्त श्रीधर: देखिए, औद्योगिक विकास प्रायः शहरों या शहरों के आसपास ही केंद्रित रहता है। हमारे यहाँ मंडीदीप, पीथमपुर, मालनपुर, पीलेखेड़ी जैसे औद्योगिक क्षेत्र विकसित हुए। उद्योगों के लिए सड़क, परिवहन, बिजली, शिक्षा, चिकित्सा और अन्य मूलभूत सुविधाएँ आवश्यक होती हैं, इसलिए वे सामान्यतः शहरों के निकट ही स्थापित होते हैं।लेकिन अर्जुन सिंह जी का विशेष आग्रह यह रहता था कि जहाँ भी उद्योग स्थापित हों, वहाँ की स्थानीय आबादी को अधिक से अधिक रोजगार मिले।वे जानते थे कि इंजीनियर, वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ बाहर से आएँगे, क्योंकि उनके लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। लेकिन जो सामान्य श्रमिक हैं, जो मेहनत-मजदूरी करके अपना जीवन चलाते हैं, उन्हें प्राथमिकता स्थानीय लोगों को मिलनी चाहिए।यदि आप पीथमपुर जैसे औद्योगिक क्षेत्र को देखें, तो वहाँ आसपास के धार तथा अन्य क्षेत्रों के हजारों लोगों को रोजगार मिला। इसका लाभ सीधे उन परिवारों तक पहुँचा जो वर्षों से मेहनत-मजदूरी पर निर्भर थे।उनकी सोच केवल उद्योग स्थापित करने तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह भी थी कि उससे स्थानीय समाज का आर्थिक विकास हो।साक्षात्कारकर्ता: जानना चाहेंगे कि मध्य प्रदेश के औद्योगिक और कृषि विकास को लेकर उनकी दीर्घकालिक सोच क्या थी?विजय दत्त श्रीधर: अर्जुन सिंह जी एक समय कृषि मंत्री भी रहे थे। कृषि के विषय में उनकी जानकारी बहुत गहरी थी।उस समय गेहूँ और धान की पारंपरिक किस्में अधिक ऊँची होती थीं। तेज हवा या वर्षा होने पर फसल गिर जाती थी, जिससे उत्पादन पर बहुत प्रभाव पड़ता था।उन्होंने कम ऊँचाई वाली उन्नत किस्मों को बढ़ावा दिया। इससे दो लाभ हुए—पहला, फसल गिरने का खतरा कम हुआ और दूसरा, प्रति हेक्टेयर उत्पादन में वृद्धि हुई।वे कृषि क्षेत्र में हो रहे वैज्ञानिक अनुसंधानों और नई तकनीकों की जानकारी स्वयं रखते थे। ऐसा नहीं था कि केवल अधिकारी उन्हें जानकारी देते हों। कई बार वे स्वयं अधिकारियों को नई किस्मों, नई तकनीकों और कृषि सुधारों के बारे में बताते थे।उन्हें खेती-किसानी के विषय में गहरी रुचि थी और वे निरंतर अध्ययन करते रहते थे।साक्षात्कारकर्ता: ओबीसी आरक्षण लागू करते समय काफी विरोध भी हुआ था। उस समय उन्होंने उस स्थिति को किस प्रकार संभाला?विजय दत्त श्रीधर: लोग सामान्यतः विश्वनाथ प्रताप सिंह के समय की चर्चा करते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश में अर्जुन सिंह जी ने इससे पहले ही इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य प्रारंभ कर दिया था।सन् 1984 में उन्होंने रामजी महाजन आयोग का गठन किया। आयोग ने पिछड़े वर्गों की पहचान की और उनके लिए शिक्षा तथा रोजगार के क्षेत्र में आवश्यक सुविधाओं और अवसरों की अनुशंसा की।उस समय सबसे अधिक ध्यान शिक्षा पर दिया गया ताकि पिछड़े वर्गों के बच्चे पढ़-लिखकर आगे बढ़ सकें। बाद में रोजगार और अन्य क्षेत्रों में भी उन्हें अवसर मिलने लगे।आज पंचायतों और नगरीय निकायों में जो ओबीसी आरक्षण दिखाई देता है, उसकी वैचारिक आधारशिला उसी समय रखी गई थी।उनकी सोच स्पष्ट थी कि समाज के सभी वर्ग साथ-साथ आगे बढ़ें। विशेष रूप से वे उन वर्गों के लिए अधिक संवेदनशील थे जिन्हें लंबे समय तक अवसर नहीं मिले थे।इसी कारण मैं मानता हूँ कि इस विषय में भी अर्जुन सिंह जी अपने समय से आगे सोचने वाले नेता थे।साक्षात्कारकर्ता: सर, फूलन देवी के आत्मसमर्पण को भारतीय इतिहास की एक ऐतिहासिक घटना माना जाता है। उस समय पुलिस का दबाव भी था और मानवीय दृष्टिकोण भी। ऐसे में अर्जुन सिंह जी ने इस विषय को किस प्रकार देखा?विजय दत्त श्रीधर: इस विषय को समझने के लिए हमें हृदय परिवर्तन की भारतीय परंपरा को समझना होगा।हमारे प्राचीन आख्यानों में अंगुलिमाल का प्रसंग मिलता है। वह एक भयानक डाकू था, लेकिन भगवान बुद्ध के सान्निध्य में उसका हृदय परिवर्तन हुआ। इसी प्रकार महर्षि वाल्मीकि का जीवन भी इसका उदाहरण है।बाद में आचार्य विनोबा भावे ने भी चंबल क्षेत्र के डाकुओं के आत्मसमर्पण का प्रयास किया। सन् 1960 में उन्होंने इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल की। उस समय राजा मानसिंह के पुत्र तहसीलदार सिंह सहित अनेक लोगों से उनका संवाद हुआ।विनोबा जी का उद्देश्य केवल डाकुओं से हथियार डलवाना नहीं था, बल्कि उन्हें समाज की मुख्यधारा में वापस लाना था।बाद में यह प्रयास कुछ कारणों से आगे नहीं बढ़ सका।फिर सन् 1972 में चंबल क्षेत्र के कई बड़े डाकू सरदारों ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के माध्यम से आत्मसमर्पण की इच्छा व्यक्त की।वे पहले विनोबा भावे के पास गए। उस समय विनोबा जी ने क्षेत्र-संन्यास ले लिया था। उन्होंने कहा—"अब आप जयप्रकाश जी के पास जाइए।"इसके बाद वे पटना गए। वहाँ पता चला कि जयप्रकाश जी दिल्ली में हैं। फिर वे दिल्ली पहुँचे।शुरू में उन्होंने अपनी वास्तविक पहचान नहीं बताई। कई दिनों तक सामान्य बातचीत होती रही।एक दिन वे जयप्रकाश जी के चरणों में गिर पड़े और बोले—"मैं डाकू हूँ। समाज की मुख्यधारा में वापस आना चाहता हूँ।"जयप्रकाश जी ने उनसे कहा—"मैं समझ गया था कि तुम कोई साधारण व्यक्ति नहीं हो। तुम्हारी बातचीत ही बता रही थी।"इसके बाद जयप्रकाश जी ने भारत सरकार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान सरकारों से विस्तृत चर्चा की।उन्होंने एक स्पष्ट शर्त रखी—जो लोग आत्मसमर्पण करेंगे, उनके मुकदमे कानून के अनुसार चलेंगे, उन्हें अपने अपराध स्वीकार करने होंगे, सज़ा भी मिलेगी, लेकिन किसी को भी मृत्युदंड नहीं दिया जाएगा।साथ ही यह भी तय हुआ कि जिन अपराधों में वे वास्तव में शामिल नहीं थे, उनमें उन्हें झूठा नहीं फँसाया जाएगा।इसी विश्वास के आधार पर 14 अप्रैल 1972 से 15 मई 1972 के बीच जौरा (मुरैना) स्थित गांधी आश्रम में जयप्रकाश नारायण की उपस्थिति में लगभग 270 डाकुओं ने महात्मा गांधी के चित्र के सामने अपने हथियार डाल दिए।यह विश्व इतिहास की अपनी तरह की एक अद्वितीय घटना थी।अर्जुन सिंह जी इन सभी ऐतिहासिक घटनाओं का गहराई से अध्ययन करते थे। वे मानते थे कि यदि अवसर मिले तो हर व्यक्ति समाज की मुख्यधारा में लौट सकता है।इसी सोच के कारण बाद के वर्षों में उन्होंने फूलन देवी सहित अनेक आत्मसमर्पण करने वाले लोगों के प्रति भी मानवीय दृष्टिकोण अपनाया और उनके पुनर्वास का समर्थन किया।विजय दत्त श्रीधर: अर्जुन सिंह जी बहुत अध्ययनशील व्यक्ति थे। मेरी समझ से वे उन विरले राजनेताओं में थे, जिनकी सबसे बड़ी शक्ति उनका निरंतर अध्ययन था।उनके निजी पुस्तक-संग्रह में लगभग 1300 पुस्तकें थीं। मैंने स्वयं उन पुस्तकों को देखा है। शायद ही कोई ऐसी पुस्तक होगी, जिसके पन्नों पर उनकी पेंसिल से की गई टिप्पणी, रेखांकन (Underline) या नोट न मिले हों।इसका अर्थ था कि वे केवल पुस्तकें इकट्ठी नहीं करते थे, बल्कि उन्हें गंभीरता से पढ़ते भी थे।उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी। इतिहास, साहित्य, राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था—लगभग हर विषय के संदर्भ उनके मन में सुरक्षित रहते थे। जब किसी विषय पर चर्चा होती, तो वे तुरंत उससे संबंधित ऐतिहासिक उदाहरण भी सामने रख देते थे।इसी अध्ययनशीलता के कारण उनके निर्णयों में गहराई दिखाई देती थी।बाद के वर्षों में चंबल क्षेत्र में डकैती की समस्या लगभग समाप्त हो गई। समाज की मुख्यधारा में लौटने की प्रक्रिया ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।साक्षात्कारकर्ता: अब हम भारत के इतिहास की एक अत्यंत दुखद घटना—भोपाल गैस त्रासदी—की चर्चा करना चाहेंगे। उस समय क्या कोई ऐसा क्षण आपको याद है जब अर्जुन सिंह जी ने औपचारिकताओं से ऊपर उठकर तत्काल राहत पहुँचाने का कार्य किया हो?विजय दत्त श्रीधर: बिल्कुल।जब भोपाल गैस त्रासदी हुई, तब सबसे पहले पत्रकार राजकुमार केसवानी का नाम याद आता है। उन्होंने दुर्घटना से पहले ही कई लेखों के माध्यम से चेतावनी दी थी कि यदि सुरक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया, तो बहुत बड़ी दुर्घटना हो सकती है।दुर्भाग्य से उनकी चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया गया।फिर वह भीषण रात आई और देखते ही देखते हजारों लोग प्रभावित हो गए।उस समय सबसे बड़ी समस्या यह थी कि किसी को समझ ही नहीं आ रहा था कि तत्काल क्या किया जाए।ऐसी स्थिति में अर्जुन सिंह जी ने सबसे पहले उन लोगों के बारे में सोचा, जो रोज़ कमाकर अपना जीवन चलाते थे। गैस त्रासदी के कारण उनका रोजगार अचानक छिन गया था।उन्होंने तत्काल 15 करोड़ रुपये मूल्य के अनाज की व्यवस्था करवाई।शहर के अनेक विद्यालयों में राहत शिविर बनाए गए। प्रभावित परिवारों के रहने, भोजन और आवश्यक सहायता की व्यवस्था की गई।चिकित्सा व्यवस्था को भी तत्काल सक्रिय किया गया। अनेक वरिष्ठ चिकित्सकों की टीमों को राहत कार्य में लगाया गया, ताकि प्रभावित लोगों का उपचार शीघ्र हो सके।जो लोग अपने परिवार, रोजगार और सामान्य जीवन से अचानक वंचित हो गए थे, उनके लिए सरकार ने तत्काल राहत उपलब्ध कराई।मुकदमे, कानूनी कार्रवाई और अन्य प्रक्रियाएँ बाद की बात थीं।उस समय सबसे महत्वपूर्ण कार्य था—पीड़ित लोगों को तत्काल राहत पहुँचाना, और यह कार्य अर्जुन सिंह जी ने पूरी संवेदनशीलता के साथ किया।उनकी प्राथमिकता स्पष्ट थी—"जिसके हाथ से आजीविका छिन गई है, उसके घर का चूल्हा बंद नहीं होना चाहिए।"यही कारण था कि राहत कार्यों में उन्होंने किसी प्रकार की देरी नहीं होने दी।साक्षात्कारकर्ता: भारत भवन ने भोपाल की एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बनाई। इसकी स्थापना में श्री अर्जुन सिंह जी की व्यक्तिगत भूमिका और दृष्टि क्या रही?विजय दत्त श्रीधर: भारत भवन वास्तव में कलाओं का घर है। पहले भी इस प्रकार की कल्पना की गई थी कि देश के प्रत्येक राज्य की राजधानी में ऐसा एक सांस्कृतिक केंद्र होना चाहिए, जहाँ साहित्य, संगीत, रंगमंच, चित्रकला और अन्य कलाओं का समन्वित विकास हो सके। लेकिन इस दिशा में ठोस पहल नहीं हो पाई थी।अर्जुन सिंह जी के मुख्यमंत्री रहते हुए इस योजना को साकार करने का कार्य प्रारंभ हुआ। इस पूरी परिकल्पना को मूर्त रूप देने में अशोक वाजपेयी जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही और उन्हें अर्जुन सिंह जी का पूरा सहयोग तथा विश्वास प्राप्त था।वे उन्हें पूरी स्वतंत्रता देते थे। योजनाओं पर चर्चा होती थी, सुझाव दिए जाते थे और फिर उन्हें आगे बढ़ाने का पूरा अवसर मिलता था।भारत भवन की स्थापना के बाद देश के लगभग सभी प्रमुख साहित्यकार, कलाकार, संगीतज्ञ, रंगकर्मी और चित्रकार वहाँ आमंत्रित किए जाने लगे। उसी काल में कालिदास सम्मान जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों की गरिमा भी नई ऊँचाइयों तक पहुँची।अर्जुन सिंह जी स्वयं इन कार्यक्रमों में पूरे मन से उपस्थित रहते थे।मुझे एक घटना आज भी याद है।प्रख्यात साहित्यकार अज्ञेय जी पहली बार भारत भवन आए थे। कार्यक्रम में अर्जुन सिंह जी को अध्यक्षता करनी थी। उन्होंने मंच पर जाकर अज्ञेय जी का स्वागत किया, लेकिन उसके बाद मंच पर बैठने के बजाय सामने श्रोताओं के बीच जाकर बैठ गए।जब उनसे कहा गया—"आपको तो मंच पर बैठना चाहिए।"तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा—"नहीं, मैं अज्ञेय जी को सुनने आया हूँ। मैं सामने बैठकर उनका व्याख्यान सुनूँगा।"यही उनका बड़प्पन था।वे कलाकारों और साहित्यकारों का केवल औपचारिक सम्मान नहीं करते थे, बल्कि वास्तव में उनकी प्रतिभा का आदर करते थे।उनके समय में बड़े साहित्यकारों और कलाकारों का स्वागत करने के लिए वरिष्ठ अधिकारी स्वयं हवाई अड्डे या रेलवे स्टेशन तक जाते थे। अतिथियों को सम्मानपूर्वक विदा भी किया जाता था।राजनीति में रहते हुए भी उन्होंने शिष्टाचार, संस्कार और सांस्कृतिक सम्मान की एक परंपरा स्थापित की।साक्षात्कारकर्ता: क्या संघर्ष कर रहे कलाकारों और साहित्यकारों की उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर भी सहायता की?विजय दत्त श्रीधर: बिल्कुल।ऐसी अनेक घटनाएँ हैं, जब उन्होंने बिना किसी प्रचार के आर्थिक और व्यक्तिगत सहायता उपलब्ध कराई।लेकिन उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे किसी पर एहसान नहीं जताते थे। उन्होंने कभी यह प्रयास नहीं किया कि लोग सार्वजनिक रूप से उनकी प्रशंसा करें।कई लोगों की सहायता उन्होंने इस प्रकार की कि उसके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी भी हुई।उनके लिए सहायता करना कर्तव्य था, प्रदर्शन नहीं।साक्षात्कारकर्ता: सर, यदि हम अर्जुन सिंह जी के व्यक्तिगत जीवन और कार्यशैली की बात करें, तो उनकी दिनचर्या कैसी थी? क्या वे अपने काम को लेकर बहुत अनुशासित थे?विजय दत्त श्रीधर: निस्संदेह। अनुशासन उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक था।वे समय के अत्यंत पाबंद थे। दिनभर की बैठकों, अधिकारियों से चर्चा, जनसंपर्क, राजनीतिक कार्यक्रमों और अध्ययन—इन सबके बीच वे अपने समय का बहुत व्यवस्थित ढंग से उपयोग करते थे।उनकी एक विशेष आदत थी कि वे प्रत्येक विषय की पूरी तैयारी करके बैठते थे।यदि किसी विभाग की समीक्षा बैठक होती, तो उससे पहले वे उससे संबंधित सभी फाइलें, आँकड़े और आवश्यक दस्तावेज़ पढ़ लेते थे। अधिकारी जब बैठक में आते थे, तब उन्हें यह अनुभव हो जाता था कि मुख्यमंत्री ने विषय का गहन अध्ययन पहले ही कर लिया है।इस कारण बैठकों में केवल औपचारिक चर्चा नहीं होती थी, बल्कि विषय की गहराई तक बात पहुँचती थी।वे अधिकारियों से कठिन प्रश्न भी पूछते थे, लेकिन उनका उद्देश्य किसी को असहज करना नहीं होता था। वे चाहते थे कि प्रशासन पूरी तैयारी और गंभीरता के साथ कार्य करे।साक्षात्कारकर्ता: क्या वे लोगों से मिलने-जुलने में भी उतने ही सहज थे?विजय दत्त श्रीधर: बिल्कुल।उनके यहाँ मिलने आने वालों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता था।एक ओर वरिष्ठ अधिकारी, न्यायविद, साहित्यकार और उद्योगपति उनसे मिलते थे, तो दूसरी ओर गाँव से आया कोई साधारण किसान, मजदूर या छात्र भी उतनी ही सहजता से अपनी बात रख सकता था।वे सामने वाले की बात पूरी गंभीरता से सुनते थे।कई बार ऐसा होता था कि कोई व्यक्ति बहुत भावुक होकर अपनी समस्या बताता था। अर्जुन सिंह जी बीच में उसे रोकते नहीं थे। पहले पूरी बात सुनते, फिर संबंधित अधिकारी को बुलाकर तत्काल आवश्यक निर्देश देते थे।उनका मानना था कि शासन का उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान करना है, केवल फाइलों का निपटारा करना नहीं।साक्षात्कारकर्ता: क्या वे अपने सहयोगियों को भी पढ़ने और निरंतर सीखने के लिए प्रेरित करते थे?विजय दत्त श्रीधर: हाँ, और यह उनकी एक बहुत महत्वपूर्ण विशेषता थी।वे स्वयं निरंतर पढ़ते थे, इसलिए चाहते थे कि उनके साथ काम करने वाले लोग भी अध्ययनशील हों।किसी पुस्तक, लेख या रिपोर्ट में यदि उन्हें कोई महत्वपूर्ण बात मिलती, तो वे कई बार उसे अपने सहयोगियों को पढ़ने के लिए भी देते थे।उनका विश्वास था कि केवल अनुभव पर्याप्त नहीं होता, निरंतर अध्ययन भी उतना ही आवश्यक है।इसी कारण उनके साथ काम करने वाले अनेक अधिकारी और सहयोगी आज भी उन्हें एक अध्ययनशील, संवेदनशील और दूरदर्शी नेता के रूप में याद करते हैं।साक्षात्कारकर्ता: अंत में मैं आपसे यह जानना चाहूँगा कि यदि आज की युवा पीढ़ी अर्जुन सिंह जी के जीवन से कोई सबसे बड़ी सीख लेना चाहे, तो वह क्या होगी?विजय दत्त श्रीधर: मेरे विचार से सबसे पहली सीख है—निरंतर अध्ययन।आज सार्वजनिक जीवन में बहुत से लोग सक्रिय हैं, लेकिन पढ़ने की आदत धीरे-धीरे कम होती जा रही है।अर्जुन सिंह जी का मानना था कि यदि कोई व्यक्ति समाज का नेतृत्व करना चाहता है, तो उसे इतिहास, साहित्य, संविधान, राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज—इन सभी विषयों का निरंतर अध्ययन करते रहना चाहिए।दूसरी महत्वपूर्ण बात थी—संवेदनशीलता।वे मानते थे कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का दायित्व भी है।उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन में अनेक बड़े निर्णय लिए, लेकिन उन निर्णयों के केंद्र में सदैव आम नागरिक रहा।चाहे आदिवासी समाज हो, किसान हों, मजदूर हों, रिक्शा चालक हों, झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले परिवार हों या शिक्षा से वंचित बच्चे—वे हर निर्णय में अंतिम पंक्ति के व्यक्ति के हित को प्राथमिकता देते थे।तीसरी बात, जो मुझे सबसे अधिक प्रभावित करती है, वह है—विनम्रता।इतने बड़े पदों पर रहने के बाद भी उनके व्यवहार में कभी अहंकार दिखाई नहीं दिया।वे विद्वानों का सम्मान करते थे, कलाकारों से सीखते थे, अधिकारियों की बात सुनते थे और सामान्य नागरिक की समस्या को भी उतनी ही गंभीरता से लेते थे।यही कारण है कि आज भी उनसे जुड़े लोग उन्हें केवल एक सफल राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि एक संवेदनशील, अध्ययनशील और संस्कारित व्यक्तित्व के रूप में याद करते हैं।साक्षात्कारकर्ता: सर, आपने अपने लंबे अनुभवों और संस्मरणों के माध्यम से श्री अर्जुन सिंह जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के अनेक ऐसे पक्ष हमारे सामने रखे, जिनके बारे में नई पीढ़ी को बहुत कम जानकारी है।आपने अपना बहुमूल्य समय दिया और इतने विस्तार से अपने अनुभव साझा किए, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।विजय दत्त श्रीधर: आपका भी धन्यवाद।मेरा विश्वास है कि इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह नहीं होता, बल्कि उन व्यक्तित्वों की प्रेरणा भी होता है जिन्होंने अपने समय में समाज और देश के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए।यदि नई पीढ़ी ऐसे व्यक्तित्वों के जीवन का अध्ययन करेगी, तो उसे केवल इतिहास की जानकारी ही नहीं मिलेगी, बल्कि सार्वजनिक जीवन के मूल्यों, संवेदनशीलता, अध्ययन, सेवा और नेतृत्व की भी प्रेरणा मिलेगी।धन्यवाद।

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हृदय की शल्य-क्रिया से पूर्व श्री अर्जुनसिंह द्वारा लिखा पत्र

हृदय की शल्य-क्रिया से पूर्व श्री अर्जुनसिंह द्वारा लिखा पत्रयह वह पत्र है जो 22 अक्टूबर 1990 को एस्कॉर्ट हास्पिटल में, हार्ट ऑपरेशन के लिये ऑपरेशन थिएटर में ले जाने और एनेस्थीसिया दिये जाने से पूर्व श्री अर्जुनसिंह ने स्वयं अपनी क़लम से लिखा था। यह पत्र श्री अर्जुनसिंह के जीवन, विचार, कल्पना, साधना, तपस्या, राष्ट्रभक्ति, समाजकल्याण, धर्म, पंथ, पूजा और प्रभु के प्रति उनकी साधना और भावना का दर्पण है।ॐमेरे राम, रहीम और ईसा तुम कहॉ हो?राम, तुम्हारी कृपा का आभास तो सब से पहले अपनी मॉ की गोद में हुआ। तुम्हारे गुणों से प्रेम, करूणा, वात्सल्य, अनुशासन, कर्तव्यपरायणता और आसुरी शक्तियों से संघर्ष करने के असीमित साहस से। तस्वीर तो पॉच-छह वर्ष की उम्र में देखी जब संत तुलसीकृत रामायण देखने और सुनने का अवसर मिला। बाल राम, युवा राम और योद्धा राम- तीनों मूर्तियों का ओज और आत्मबल समान था और देश के करोड़ों हिन्दुओं की भॉति मेरे भी मानस पटल में सदैव सदैव के लिये अंकित हो गई लेकिन मॉ की गोद में अवगत हुये गुणों से उन्हें कभी अलग नही कर सका।सात बरस की उम्र में शिक्षा के लिये प्रयाग के सेंट थेरिस कैथोलिक कान्वेंट में बोर्डर की हैसियत से भर्ती होने पर दिनचर्या के रूप में प्रातः गिरजाघर जाना और प्रार्थना करनी पड़ती थी। बहुत आश्चर्य हुआ, भगवान ईसा मसीह को क्रॉस पर टॅंगे देखकर और कुछ दुःख भी हुआ कि जिसे भगवान का इकलौता पुत्र मानते है उन्हें ऐसी यातना क्यों सहनी पड़ी? भगवान जो सर्वशक्तिमान है, उन्होंने अपने पुत्र की रक्षा क्यों नही की? धीरे-धीरे ज्ञान हुआ कि ईसा मसीह भी क्रॉस पर उन्हीं गुणों के पालन व रक्षा के लिये चढ़ाये गये जिनके अनवरत पालन से राम को मर्यादा पुरूषोत्तम कहा गया। भावना व भक्ति का अटूट मिश्रण हुआ और आत्मबल का प्रादुर्भाव हुआ।इस्लाम धर्म के बारे में उर्दू पढ़ाने वाले मौलवी साहब से जानकारी मिली, लेकिन जब उन्होंने कहा कि मैं आपको अल्लाह ताला की कोई तस्वीर नही दे सकता तो मुझे लगा, किसके नाम या आकार के सहारे पवित्र कुरान शरीफ पढ़ा जा सकता है। उन्होंने मुझसे कहा-आप एक दफे इस्लाम की कुछ मौलिक बातें पढ़िये तो। गुरू की आज्ञा समझकर मैंने पढ़ा। ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता गया, लगा कि यह सब तो वही है जो राम व ईसा से जुड़ी बातें हैं, गुण हैं। मौलवी साहब से तो मैने यह बात नही कही, इस संकोच में कि कहीं उन्हें नागवार न गुजरे लेकिन जो हमारे निजी गार्जियन पं. बृजवासी लाल पांडे जी थे (जो दुर्भाग्य से अब नही हैं) उनसे मैंने जरूर कहा कि इस्लाम धर्म के प्रति श्रद्धा व समर्पण की भावना कैसे जागृत की जा सकती है जब इस धर्म के आदिपुरूष का मानवीय स्वरूप ही देखने को नहीं मिलता। पंडित जी ने जो उत्तर दिया उसने मुझे अपनी भारतीय विरासत का विराट दर्शन कराया और धर्म क्या है, उसको सही रूप में समझने का अवसर दिया। उन्होंने कहा- प्रत्येक धर्म आस्था, विश्वास और कर्मठता का सुन्दर समन्वय हैं। हिन्दू धर्म आस्थाओं का पुंज है, ईसाई धर्म विश्वासों की कसौटी पर खरा उतरने का अलौकिक अवसर है और इस्लाम धर्म कठिन से कठिन परिस्थितियों में कर्मठता का प्रमाण देने का माध्यम हैं।कोई भी व्यक्ति अपनी निजी मान्यताओं व आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये चाहे जो गढ़ता व बुनता रहे लेकिन इनके बाहर जाकर धर्म का पालन नही कर सकता है। यही उन्होंने कहा- गीता में भगवान कृष्ण का अंतिम उपदेश है।इस घटना को हुये 45 वर्ष बीत गये लेकिन आज भी एक-एक शब्द और उसका अर्थ मेरे हृदय पटल पर केवल अंकित ही नहीं है बल्कि मैंने इसी को अपनी समृद्ध विरासत व धरोहर मानकर जीवन के अनेकों उतार-चढ़ाव पार किये। मंदिर हो, मस्जिद हो, गिरजाघर हो या गुरूद्वारा हो, कहीं भी परमात्मा के दयालु, करूणामय व स्थितप्रज्ञ दर्शन करने में मुझे कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई।आज इस समृद्ध विरासत के बिखरने का खतरा उत्पन्न हो गया है। विडंबना यह है कि वह खतरा उन्हीं धर्मों के माध्यम से पैदा किया जा रहा है जिनके पाक सिद्धान्तों से यह सदियों में निर्मित हुआ था। युग पुरूष महात्मा गॉधी के चरण स्पर्श करने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ था। राष्ट्रनायक पंडित नेहरू के तेजस्वी हाथों ने मेरे कंधों को स्पर्श करके संघर्ष और बलिदान से उत्पन्न अजेय ऊर्जा को मुझमें स्थानांतरित किया था, जिसके बल व प्रेरणा से राष्ट्रमाता श्रीमती इन्दिरा जी के संघर्षशील नैतृत्व में कई उत्तेजक क्षणों को अनुभव करने का अवसर मिला और आज भी देश की महान संस्था कांग्रेस में राजीव जी के अनुशासित सिपाही की हैसियत से सेवा व संघर्ष के अनवरत अभियान में लगे रहने की शक्ति मिली।सहसा दिन- 5 अक्टूबर को मध्यान्ह इस सब पर विराम लगता दिखा- लेकिन प्रभु कृपा से ऐसा हुआ नहीं। आज सुबह मुझे बताया गया कि मेरे हृदय की शल्य चिकित्सा करनी पड़ेगी। कोई भी शल्यक्रिया चिन्ता का विषय बना जाती है, फिर हृदय की शल्य चिकित्सा तो होनी हीं चाहिए। हर मनुष्य के नाते मुझे भी थोड़ी चिन्ता है, लेकिन मुझे अंदर से प्रेरणा मिली कि कुछ जीवन का लेखा-जोखा भी तो कर डालो। एक तो व्यक्तिगत लेखा-जोखा होता है, उसमें मेरी दिलचस्पी बिलकुल नहीं है। उसे करने वाले दोस्त व दुश्मन दोनों काफी है, इसलिये सही ही होगा।आज इन क्षणों में- इसके पूर्व कि बेहोशी दे दी जावे, मैं केवल राम, रहीम और ईसा को खोजना चाहता था और पूछना चाहता था कि कहॉ हो जो मेरा प्यारा देश बिना पतवार के नाविक के सहारे इतिहास के भंवर की ओर तेजी से बढ़ता जा रहा है। राम, तुम्हारे भक्तों की संख्या तो असंख्य है, उसमें निषादराज भी है- शबरी भी है और संत तुलसीदास भी है। लेकिन आज के इन भक्तों में तो ये आदर्श नहीं रहे। आज के इन विख्यात भक्तों ने यह भी नहीं सोचा कि आपने तो आसुरी शक्तियों के भयंकर प्रतीक रावण से बिना रथ पर बैठे ही संग्राम करके उसे पराजित किया- आधुनिक भक्तों ने तो आपके नाम से रथ बनाकर, उस पर विराजमान होकर दिग्विजय के लिये निकल पड़े हैं। और वह भी विजय किसी आसुरी शक्ति के ऊपर नहीं, बल्कि अपने ही देशवासियों के ऊपर। उन्हें कौन बताए कि संत तुलसी को रामचरित मानस रचने के पश्चात इनाम के बतौर अकबर ने मनसबदारी और बहुत सा धन उपहार में भेजा था। संत तुलसीदास का अकबर को उत्तर था-‘‘हम चाकर रघुवीर के, पटो लिखो दरबार।अब तुलसी का होहिंगे, नर के मनसबदार।।’’परन्तु प्रभु आज के रामभक्त तो नर क्या, पिशाचों की मनसबदारी करने को तत्पर हैं।मेरे अल्लाह, आज कर्तव्य की, कर्मठता की कसौटी पर उतरने को बेताब होने वाले तुम्हारे भक्त अपनी आवाज की बुलंदगी को नाप रहें है- शायद कबीर के उस दोहे से वे परिचित नहीं है-‘‘चींटी के पग घुंघरू बाजे तो तेरा मालिक सुनता है।ऊपर चढ़कर बांग लगाए, क्या तेरा मालिक बहरा है।’’आवाज की बुलंदगी नहीं, उसकी गहराई की वकत होनी चाहिए।मेरे ईसा मसीह! अपनी असीमित करूणा और विश्वास से उपजा दृढ़ संकल्प का अथाह सागर मेरे भारत में उड़ेल दो ताकि घृणा और द्वेष की धधकती ज्वाला शांत हो जाये और हम अपने गौरवमयी इतिहास की यात्रा निरंतर जारी रखें। कोई भी धर्म व विश्वास राष्ट्रधर्म के पीछे आता है, यह हमारी परंपरा रही। बाणों की शय्या में लेटे भीष्म पितामह ने अपने आखरी उपदेश में यही तो कहा था कि जब कभी देष के बॅंटवारे का सवाल आ जाये तो राष्ट्रधर्म का पालन करने के लिये कुरूक्षेत्र में आना ही पड़ेगा। मुश्किल यह है कि आज पाण्डवों व कौरवों की सेना अलग-अलग नहीं, बल्कि मिल-जुल गई है। कौन लड़ेगा जब हर ऑगन को लोग कुरूक्षेत्र बनाने पर तुले हुये हैं।केवल राम, रहीम और ईसा की संयुक्त कृपा ही यह संभव कर दिखा सकती है। भगवान राम! मैं भी बजरंग दल का एक अकिंचन सदस्य हूॅ लेकिन उस बजरंग दल का नहीं, जो त्रिशूल और नंगी तलवारों से माताओं और बहनों को आतंकित करते हैं। मैं आपके अनन्य भक्त बजरंगबली के दल का हूॅ जिनका एकमात्र आदर्श था- ‘‘राम काज कीन्हें बिना, मोहि कहॉं विश्राम।’’ इन्हीं शब्दों को स्मरण करते हुये बेहोंशी में जाऊॅगा और अगर तुम्हें इस अकिंचन सेवक से और कुछ काम लेना श्रेयस्कर दिखे तो वापस बुला लेना- वर्ना जीवन में जो कुछ तुम्हारी कृपा से कर सका हूॅ- मेरे लिये पर्याप्त है।पुनश्च-भगवन, आपकी प्रेरणा से संत तुलसीदास ने आपकी महिमा का वर्णन करके सभी प्राणियों के लिये एक प्रेरणास्त्रोत के रूप में रामचरित मानस दिया। इतनी कृपा और कर देते तो इस देश पर आपत्ति के बादल आज नहीं मंडराते, यदि संत तुलसी ने अयोध्या जी में आपके जन्मस्थान पर निर्मित मंदिर का भी वर्णन कर दिया होता। वो तो केवल इतना ही कहकर रूक गये- ‘‘भये प्रकट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी’’-कुछ अनुत्तरित प्रश्न आने वाली पीढ़ियों के विवेक पर हरदम छूट जाते हैं। हम सबको कम से कम इतनी सद्बुद्धि तो जरूर दीजिये कि इनका उत्तर आपके सच्चे भक्तों की भॉति खोजने का प्रयास तो करें। 

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स्व. कुंवर अर्जुन सिंह: संघर्ष, सत्ता और सामाजिक न्याय की विरासत

विंध्य अंचल की धरती ने भारतीय राजनीति को अनेक प्रभावी और जुझारू नेतृत्व प्रदान किए हैं, किंतु स्वर्गीय कुंवर अर्जुन सिंह का स्थान उनमें विशिष्ट और कालजयी है। एक छोटी-सी जागीर में जन्म लेकर उन्होंने अपने व्यक्तित्व, राजनीतिक साहस और प्रशासनिक दूरदृष्टि से देश पर न केवल मध्यप्रदेश बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी अमिट छाप छोड़ी। वे ऐसे नेता थे जिनकी पहचान सत्ता से नहीं, बल्कि शोषितों, वंचितों, दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की आवाज बनने से बनी।कुंवर अर्जुन सिंह का जन्म 5 नवंबर 1930 को मध्यप्रदेश के सीधी जिले की चुरहट जागीर के राव घराने में हुआ। विंध्य क्षेत्र में वे आज भी स्नेह और सम्मान से “दाऊ साहब” के नाम से जाने जाते हैं। राजघराना सदस्य रहते हुए लंबी बीमारी के बाद 4 मार्च 2011 को उनका निधन हुआ, किंतु उनके विचार, निर्णय और कार्य आज भी जीवंत हैं।अर्जुन सिंह की राजनीति किसी दल के सहारे नहीं, बल्कि उनके आत्मसम्मान और व्यक्तित्व से प्रारंभ हुई। वर्ष 1952 में तत्कालीन विंध्य प्रदेश में चुरहट विधानसभा क्षेत्र से उनके पिता राव शिवबहादुर सिंह को पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा मंच से कांग्रेस प्रत्याशी घोषित किया गया, किंतु बाद में यह घोषणा वापस ले ली गई। इसके बावजूद राव शिवबहादुर सिंह ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा, परंतु उन्हें पराजय मिली। इस घटना ने युवा अर्जुन सिंह के मन पर गहरा प्रभाव डाला और यहीं से उनके भीतर राजनीतिक संघर्ष की दृढ़ चेतना विकसित हुई।वर्ष 1957 में अर्जुन सिंह ने कांग्रेस का टिकट लेने से इंकार करते हुए निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुरहट विधानसभा चुनाव लड़ा। उस समय यह माना जाता था कि कांग्रेस का टिकट जीत की गारंटी है, किंतु अर्जुन सिंह ने इस धारणा को तोड़ते हुए प्रभावशाली ढंग से ऐतिहासिक विजय प्राप्त की। यह जीत उनके राजनीतिक कौशल और जनसमर्थन की पहली ठोस अभिव्यक्ति थी।1961 में मध्यप्रदेश विधानसभा में विधायकों की संपत्ति घोषणा से संबंधित प्रस्ताव पर अर्जुन सिंह ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखा। उनके नैतिक साहस और स्पष्ट विचारों से प्रभावित होकर नेहरू ने उन्हें दिल्ली बुलाया। लंबी विचार-विमर्श के बाद अर्जुन सिंह कांग्रेस में शामिल हुए। यह उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ।1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने पर अर्जुन सिंह को मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया। उन्होंने विपक्ष की भूमिका को केवल विरोध तक सीमित न रखकर सरकार की नीतियों की तार्किक, तथ्यात्मक और प्रभावी आलोचना में बदला। उनके सशक्त संसदीय हस्तक्षेपों के कारण जनता सरकार को तीन वर्षों में तीन मुख्यमंत्री बदलने पड़े—कैलाश जोशी, वीरेंद्र सकलेचा और सुंदरलाल पटवा। अंततः राष्ट्रपति शासन लगा और चुनाव में कांग्रेस पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटी।वर्ष 1980 में अर्जुन सिंह पहली बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने और पूरे पाँच वर्षों तक राज्य का नेतृत्व किया। इसके बाद वे दो बार अल्पकाल के लिए पुनः मुख्यमंत्री बने। उनका मुख्यमंत्रीकाल सामाजिक न्याय, मानवीय दृष्टिकोण और प्रशासनिक दृढ़ता का प्रतीक माना जाता है। इसी कार्यकाल में मुझे भी भारतीय विधानसभा 1980 से 1985 में विधायक का सदस्य बनने का अवसर मिला और माननीय श्री अर्जुन सिंह जी मुख्यमंत्री चुने गए तब मुझे भी उनकी राजनीतिक पाठशाला में संसदीय राजनीतिक प्रक्रिया और नियमों को सीखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।अर्जुन सिंह उन मुख्यमंत्रियों में अग्रणी थे जिन्होंने पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के कल्याण को शासन की प्राथमिकता बनाया। उन्होंने सामाजिक समानता को केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि राज्य की जिम्मेदारी माना। उनके कार्यकाल में वंचित वर्गों के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएँ प्रारंभ की गईं, जिनसे उन्हें शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सम्मान के अवसर मिले।उन्होंने म.प्र. में तेंदूपत्ता को आय का एक बड़ा साधन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो जनजातीय समुदायों के सशक्तीकरण का एक बड़ा माध्यम बना। श्री सिंह ने तेंदूपत्ता को प्राथमिक वनोपज घोषित कर तेंदूपत्ता व्यापार का राष्ट्रीयकरण किया। उसे आदिवासियों एवं वनवासियों के आय का साधन बनाया और तेंदूपत्ता तोड़ने वाले गरीब मजदूरों को मजदूर से मालिक बनाया।श्री अर्जुन सिंह जी मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए म.प्र. में वाम दखलकार कानून बनाकर और भूमिहीनों एवं जनजातीय समुदाय के लोगों को भूमि-स्वामी अधिकार प्रदान किया, जो भूमि सुधार कानून की दिशा में एक बड़ा कदम था। वाम दखलकार कानून के कारण लंबे समय से रह रहे भूमिहीनों को मालिकाना हक देने का प्रावधान किया गया। गरीब एवं वंचित वर्ग के लोगों के घरों के लिए एक बत्ती श्री कनेक्शन का प्रावधान भी श्री अर्जुन सिंह जी ने अपने मुख्यमंत्री रहते किया था।शहरी गरीबों के प्रति उनकी संवेदनशीलता का सबसे बड़ा उदाहरण मलिन बस्तियों का नियमितीकरण रहा। उन्होंने झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों को अतिक्रमणकारी नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों से वंचित लोग माना। मलिन बस्तियों में निवासरत परिवारों को पट्टे प्रदान कर उन्हें कानूनी पहचान दी गई, जिससे लाखों लोगों को आवासीय सुरक्षा और सम्मानपूर्ण जीवन मिला।अर्जुन सिंह के मुख्यमंत्रीकाल की सबसे बड़ी उपलब्धियों में चंबल अंचल में दस्यु समस्या का समाधान रहा। उन्होंने केवल बल प्रयोग के बजाय संवाद और आत्मसमर्पण की नीति अपनाई। इसी नीति के अंतर्गत अनेक कुख्यात दस्युओं ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें फूलन देवी का आत्मसमर्पण विशेष रूप से ऐतिहासिक माना जाता है। यह निर्णय कानून-व्यवस्था के साथ मानवीय दृष्टिकोण का भी उत्कृष्ट उदाहरण था।वर्ष 1980 से 1985 में अर्जुन सिंह ने अपने मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल के दौरान आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ भारतीय संस्कृति परंपरा के संरक्षण पर भी विशेष ध्यान देते हुए मध्यप्रदेश को देश की कला और संस्कृति की राजधानी के रूप में स्थापित करने की मंशा के अनुरूप वर्ष 1982 में भोपाल में भारत भवन का निर्माण कराया और तत्समय इस भवन का उद्घाटन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा से कराया गया था। इस उद्घाटन अवसर पर श्रीमती गांधी ने अपने उद्घाटन में कहा कि, “दिल्ली में नहीं हो रहा है, वो भोपाल में हो रहा है।” आज भारत के लोग भोपाल को भी देश की संस्कृति और कला के केंद्र की राजधानी के रूप में जानने लगे हैं। उन्होंने संगीत, वेद, विचार, प्रतिवचन की स्थापना में उनकी प्रमुख भूमिका रही। वे अध्ययन-अध्यापन, विचारों के संरक्षण और सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण के लिए उन्होंने ठोस व्यवस्थाएँ कीं।उनके कार्यकाल में मध्यप्रदेश के आधारभूत संरचना के विकास पर विशेष बल दिया गया। सड़क, संचार और हवाई संपर्क को सुदृढ़ करने की दिशा में कई परियोजनाएँ शुरू की गईं। भोपाल के बैरागढ़ हवाई अड्डे के रनवे को मजबूत करने और प्रदेश के धार जिले के अंतर्गत पीथमपुर औद्योगिक विकास के क्षेत्र की अवधारणा साकार कर ऑटोमोबाइल सहित अन्य एवं उसके कल्पनुमा बनाने तथा उद्योगों में अर्जुन सिंह जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा जिसके कारण मध्यप्रदेश के औद्योगिक विकास को गति मिली। उनका सपना ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में पीथमपुर को अमेरिका के डेट्राइट शहर की तरह विकसित कर दुनिया के पूर्व का डेट्राइट शहर बनाना था। इसी तरह के करोड़ों रुपये की परियोजना का शुभारंभ उनके विकासोन्मुख दृष्टिकोण का प्रतीक था।अर्जुन सिंह को एक चतुर रणनीतिकार और सशक्त प्रशासक के रूप में जाना जाता था। राज्य की नौकरशाही पर उनकी मजबूत पकड़ अनुशासन, पारदर्शिता और कार्यकुशलता पर आधारित थी। वे निर्णय लेने में साहसी और क्रियान्वयन में स्पष्ट थे। इसलिए उनकी नीतियाँ कागजों तक सीमित नहीं रहीं।राज्य राजनीति से निकलकर वे राष्ट्रीय राजनीति में केंद्रीय मंत्री बने। इसके साथ ही पंजाब के राज्यपाल के रूप में उन्होंने आतंकवाद से जूझ रहे पंजाब में राजनीतिक शक्तियों के माध्यम से शांति बहाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस योगदान के लिए उन्हें भारत रत्न दिए जाने की मांग तक उठी।स्व. कुंवर अर्जुन सिंह भारतीय राजनीति के उन विरले नेताओं में थे, जिन्होंने सत्ता को साधन नहीं, बल्कि सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व माना। विंध्य की माटी से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति तक की उनकी यात्रा साहस, आत्मसम्मान, सामाजिक न्याय और प्रशासनिक दक्षता की अनुपम मिसाल है।संक्षेप में यह कहें कि वे केवल मुख्यमंत्री या मंत्री नहीं थे, वे एक विचार, एक संघर्ष और एक युग थे - जो स्मृतियों में नहीं, भारतीय लोकतंत्र की आत्मा में सदैव जीवित रहेंगे।

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अर्जुन सिंह: धर्मनिरपेक्ष भारत का विलुप्त सैनिक

"इतिहास किसी का इंतज़ार नहीं करता है।" अर्जुन सिंह बेशक, मध्य प्रदेश के राष्ट्रीय स्तर के राजनेता अर्जुन सिंह कोई क्रांतिकारी नेता नहीं थे। लेकिन, उत्तर-इंदिरा काल की कांग्रेस के वह एक ऐसे अथक सैनिक थे, जिनकी दृढ़ आस्था गांधी-नेहरू-आज़ाद-पटेल कालीन कांग्रेस के मूल्यों में अंतिम समय तक रही। रीवा अंचल के चुरहट के सामंती परिवेश से अपने सार्वजनिक जीवन की यात्रा की शुरुआत करने वाला यह सैनिक अंततः लोकतंत्र के अडिग सैनिक में परिवर्तित हो गया। पर वर्तमान दौर में, पूर्व केंद्रीय मंत्री व पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत अर्जुन सिंह को क्यों याद करें? आज की कांग्रेस तब की कांग्रेस नहीं रही है, काफ़ी कुछ बदल चुका है। यदि वे आज जीवित होते, तो छियानवे (सौ में छह कम) वर्ष के रहे होते। लेकिन, 5 नवंबर 1930 और 2024 के 5 नवंबर के बीच समाज और राजनीति का चेहरा बिल्कुल बदल चुका है; गंगा-जमुना-नर्मदा में काफी पानी बह चुका है और रंग बदरंग हो चुका है। तब ऐसे सैनिक को याद करने का सबब क्या है? याद आया, एक दफा अर्जुन सिंह जी ने स्वयं भोपाल में कहा था: "सैनिक मरता नहीं है, लुप्त हो जाता है।" शायद, उनके ही कथन को ध्यान में रखकर यह पत्रकार उन्हें याद करना चाहता है। अर्जुन सिंह से मेरा पहला संपर्क 1967 में भोपाल में हुआ था। तब मैं 'हिन्दुस्थान समाचार' एजेंसी के भोपाल ऑफिस में रिपोर्टर था। उन दिनों मध्य प्रदेश में द्वारका प्रसाद मिश्र के नेतृत्व में कांग्रेस सत्तारूढ़ थी और मिश्र-मंत्रिमंडल के सदस्य थे अर्जुन सिंह। प्रतिपक्ष की उभरती नेता थीं ग्वालियर की श्रीमती विजयराजे सिंधिया। किसी भी समय कांग्रेस सरकार का पतन हो सकता है, ऐसी आशंकाओं के बादल भोपाल के सियासी आसमान में छाए हुए थे। और एक रोज़ नाटकीय ढंग से खुर्राट मुख्यमंत्री मिश्र जी की सरकार का पतन हो भी गया, और मुख्यमंत्री बने रीवांचल के गोविन्द नारायण सिंह। प्रदेश की सियासत के उस संक्रमण काल में मैं उनसे विधानसभा के गलियारों में मिलता रहा। साल के अंत में मैं दिल्ली चला आया और इसके साथ ही हमारा संपर्क टूट गया। क़रीब एक दशक के अंतराल के बाद अर्जुन सिंह फिर टकराए। उन दिनों वे विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता थे और मुख्यमंत्री थे जनसंघ के कैलाश जोशी। 1978 में रतलाम ज़िले के कनाड़िया गांव में भूमि विवाद को लेकर सवर्णों ने कुछ दलितों की हत्या कर दी थी। यह हत्याकांड 'कनाड़िया ट्रेजेडी' के रूप में अखबारी सुर्खियों में था। मैंने गांव पहुँचकर कुछ ज़मीनी तथ्य जमा किए थे। इस घटना के संबंध में अर्जुन सिंह चर्चा करना चाहते थे। तब पत्रकारिता से अवकाश लेकर मैं राष्ट्रीय श्रम संस्थान के रूरल विंग में शोधकर्ता हुआ करता था। इस घटना के दो वर्ष बाद मेरी पत्रकारिता में वापसी हुई और मैं 'नई दुनिया' का दिल्ली ब्यूरो प्रमुख बना। इसके बाद अर्जुन सिंह जी के साथ संबंधों की लम्बी पारी उनके दैहिक पटाक्षेप (मार्च 2011) तक चली। इस लम्बी पारी में उन्हें कुछ करीब से देखने-समझने का अवसर मिला। सहमति-असहमति भी साथ-साथ चलती रहीं। तभी उनका एक कथन दिमाग में हमेशा झूलता रहता है: "जोशी जी, आप न कांग्रेसी हैं... और न कभी होंगे।" उनका यह मार्के का कथन हम दोनों के मध्य 'लक्ष्मण रेखा' की भूमिका निभाता रहा। वे राजनीतिक और गैर-राजनीतिक एक्टिविस्टों के साथ संबंध निर्वाह के 'पारखी' थे; ख़ामोशी के साथ रिश्ते निभाते रहते और कुशलतापूर्वक समेट भी लेते। मुझे उनसे काफी कुछ सीखने का अवसर भी मिला; सत्ता के बाहरी गलियारों में चहलकदमी भी की; दो राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं का अध्यक्ष व उपाध्यक्ष भी रहा, वह भी पूरी स्वतंत्रता के साथ। वैसे उनके जीवन के कई आयाम हैं। मैं उनकी जीवनी भी लिख चुका हूं: "अर्जुन सिंह - एक सहयात्री इतिहास का" (राजकमल प्रकाशन)। प्रस्तुत लेख में चंद अनुभवों की बात करूंगा जिनकी प्रासंगिकता मौजूदा दौर में भी है। अर्जुन सिंह कहा करते थे, "मेरे लिए धर्मनिरपेक्षता राजनीतिक जुमला नहीं, एक 'आर्टिकल ऑफ़ फेथ' (article of faith) है।" यही वजह रही कि वे साम्प्रदायिक संगठनों के निशाने पर हमेशा रहे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ उनका टकराव अंतिम समय तक रहा और कुछ छोटे-मोटे मुक़दमे भी चलते रहे। लेकिन, उन्होंने सेकुलरिज्म पर कोई समझौता नहीं किया। वे कहा करते थे कि, "जोशी जी (उन्होंने 'जी' हमेशा लगाया), सेकुलरिज्म ही भारत की पहचान और शक्ति है। इसकी अनुपस्थिति में भारत की विशिष्टता का लोप हो जाता है। कभी 'डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' पढ़िए।" उन्हें नेहरू जी के दृष्टि-संसार से बेहद प्यार था। उनके निजी पुस्तकालय में नेहरू साहित्य का विशिष्ट स्थान था। लेकिन, आज धर्मनिरपेक्षता और नेहरू, दोनों को ही विवादास्पद बना दिया गया है; उन्हें घृणा व त्याज्य के रूप में चित्रित किया जा रहा है। अर्जुन सिंह का दृढ़ मत था कि धर्म-मज़हब का रिश्ता व्यक्ति के निजी आस्था-संसार से है; इसे राज्य के क्रियाकलापों से दूर रखने में ही राष्ट्र और जनता की सुरक्षा व एकता को सुनिश्चित किया जा सकता है। लेकिन, क्या आज ऐसा हो रहा है? कार्यपालिका और न्यायपालिका के प्रमुख जिस रूप में अपनी निजी आस्थाओं का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहे हैं और मंदिर में ईश्वर से मार्गदर्शन प्राप्त कर फैसला दे रहे हैं, क्या इस पद्धति से दीर्घकाल तक आधुनिक राष्ट्र-राज्य को स्वस्थ, सुरक्षित व अखण्ड रखा जा सकता है? यह इस दौर का ज्वलंत प्रश्न है। एक राजनेता के नाते अर्जुन सिंह इसका माकूल जवाब दे सकते थे। क्या कभी किसी ने यह जानने की कोशिश की कि मध्य प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और जनता दल जैसी पिछड़ों व दलितों पर आधारित पार्टियां आज तक प्रदेश की मुख्य पार्टियां क्यों नहीं बन सकीं? क्यों केवल भाजपा और कांग्रेस ही आमने-सामने हैं? इसकी असली वजह यह है कि अर्जुन सिंह अगड़ा बनाम पिछड़ा वर्ग से जनित अंतर्विरोधों के शमन की राजनीति करते रहे। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मंडल आयोग की सिफारिशों को देश में लागू नहीं कर सकी थीं। लेकिन, उन्हीं की अनुमति से मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने प्रदेश में महाजन पिछड़ा आयोग की सिफारिशों को सफलतापूर्वक लागू कर दिखाया था। प्रदेश स्तर के पिछड़ा आयोग के गठन के माध्यम से उन्होंने उभरते अंतर्विरोध का शमन कर दिया। अर्जुन सिंह 'बेजोड़ रणनीतिकार' थे, इसीलिए लोग उनसे आतंकित भी रहते थे। शायद इसीलिए उनको इंदिरा-राजीव-सोनिया परिवार का 'जेनुइन' (genuine) विश्वास कभी नहीं मिल सका। यदि ऐसा विश्वास रहता तो वे 1991, 2004 और 2009 के सालों में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बन सकते थे और कांग्रेस को पराभव से बचा सकते थे। (ऐसे में) नरेंद्र मोदी गांधीनगर तक ही सिमटे दिखाई देते। अर्जुन सिंह सामंती पृष्ठभूमि से होते हुए भी वामपंथ के प्रति स्वाभाविक रुझान रखते थे। उनमें अपनी सरहदों और उनके पार जाने की पुख्ता समझदारी थी। उनके सरकारी निवास के कामकाजी कमरे में हमेशा व्लादिमीर लेनिन की टेबल मूर्ति का होना एक अलग ही सन्देश देता था। सारांश यह है कि वे 'लेफ्ट' और 'लेफ्ट-ऑफ़-सेन्टर' के बीच आवाजाही करते रहे। 1980 में पहली दफ़ा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने 'सर्वहारा' के नाम से कई कल्याण योजनाएं शुरू कीं, झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों की ओर ध्यान दिया और भूमि सुधार की तरफ ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने भोपाल को देश की सांस्कृतिक राजधानी बनाया; इसकी जिम्मेदारी प्रतिबद्ध तत्कालीन संस्कृति सचिव अशोक वाजपेयी को दी। शिक्षा क्षेत्र में वैज्ञानिक स्तरीय विकास के काम को वे हमेशा प्रगतिशील कवि और प्रतिबद्ध शिक्षा सचिव सुदीप बनर्जी को सौंपा करते थे। उनका 'सर्वशिक्षा अभियान' काफी चर्चित रहा। स्वयंसेवी संस्थाओं के मामले में उन्होंने 'सहमत', शबनम हाशमी और अन्य प्रगतिशील रुझान वाली संस्थाओं को भी काम दिया। याद करिए, दिसंबर 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करने से उत्पन्न साम्प्रदायिक तनाव को कम करने में उन्होंने 'सहमत' का सहयोग लिया था; अयोध्या में प्रदर्शनी लगाई गई थी। मुझे याद है, अर्जुन सिंह राव-मंत्रिमंडल के एकमात्र कैबिनेट मंत्री थे, जो प्रधानमंत्री की मर्जी के विपरीत जाकर 4 दिसम्बर 1992 को 'लखनऊ मेल' से लखनऊ गए थे। प्रधानमंत्री राव चाहते थे कि अर्जुन सिंह स्वयं को अयोध्या विवाद से दूर रखें और अयोध्या न जाएं। यहां तक कि प्रधानमंत्री ने उनसे नई दिल्ली प्लेटफॉर्म पर फोन पर बात की और ट्रेन से उतरने के लिए कहा भी। लेकिन, सिंह नहीं माने और लखनऊ तक गए। क्या आज भाजपा का कोई नेता या मोदी सरकार का कोई मंत्री ऐसा साहस दिखा सकता है? पूंजीवादी लोकतंत्र में धन की हमेशा ज़रूरत रहती आई है। लेकिन, कोई पूंजीपति अगर राज्य तंत्र और राजनीति को हांकने लगे, तो इससे लोकतंत्र का विकलांगीकरण होगा ही। अर्जुन सिंह ने निजी चर्चाओं में मेरे साथ हमेशा एक ही स्टैंड रखा: "धनपतियों को अपने आधारभूत मूल्यों व राजनीति पर हावी मत होने दो।" एक घटना याद आती है। बात शायद 1993-94 की है, सर्दी के दिन थे। एक रोज़ मैं 'एक रेस कोर्स' पहुँचा। उन दिनों अर्जुन सिंह प्रधानमंत्री निवास से सटे सरकारी बंगले में रहा करते थे। पहुँचने पर देखता हूँ कि दिवंगत धीरूभाई अंबानी उनके ऑफिशियल रूम में बैठे हुए हैं। मैं बाहर वेटिंग रूम में बैठ जाता हूँ। करीब दस मिनट के बाद अंबानी कमरे से बाहर निकलते हैं और बाहर खड़े उनके दो सहयोगी उनके कंधों को पकड़कर पोर्च में खड़ी कार में बैठा देते हैं। गौरतलब यह है कि राव-सरकार के वरिष्ठतम मंत्री अर्जुन सिंह अपने रूम की दहलीज़ को पार कर उस धनपति को विदाई देने बाहर नहीं आते हैं। इसके तत्काल बाद मैं उनसे उसी कमरे में मिलता हूँ और पूछता हूँ कि "अंबानी जी का कैसे आना हुआ?" इसके साथ ही मैंने यह भी कह दिया कि, "आप उन्हें कार तक छोड़ने नहीं गए।" वे मुस्कुराते हुए बोले, "छोड़िए जोशी जी, अंबानी जी समर्थ हैं। उनका अपना काम था और वे राव साहब से मिलकर चलने के लिए कह रहे थे।" उन दिनों राव-सिंह जंग चल रही थी। मैंने पूछा, "आपने क्या कहा?" उन्होंने बताया, “पहले मैं समझ नहीं पाया कि धीरूभाई ऐसा क्यों कह रहे हैं। फिर मैंने उनसे सिर्फ इतना ही कहा—हम सभी अपना-अपना काम कर रहे हैं; आप व्यापार करें, हम राजनीति कर रहे हैं।”एक ऐसा ही अनुभव 1987 में भी हो चुका था। तब अर्जुन सिंह संचार मंत्री हुआ करते थे और तुग़लक़ रोड पर उनका सरकारी निवास था। एक शाम मध्य प्रदेश की घटनाओं को लेकर मेरी सिंह साहब के साथ चर्चा चल रही थी। चंद मिनटों के बाद उनके सचिव बेबी ने सूचित किया कि "बिड़ला साहब (के. के. बिड़ला) आ गए हैं, क्या अंदर भेज दूं?" सिंह ने निर्देश दिया, "उन्हें गेस्ट रूम में बैठाएं और जलपान कराएं।" मैं हैरान रह गया! हमारी चर्चा जारी रही। संकोच के साथ मैंने स्वयं उनसे जाने की अनुमति मांगी। वे बोले, "आप बैठे रहिये, चर्चा पूरी कर लीजिये। आपको खबर भेजनी है। मुझे मालूम है, सेठजी क्यों आये हैं और क्या चाहते हैं। उन्हें बैठने दीजिये।" कुछ देर और बैठने के बाद सिंह स्वयं बोले, "अब आप चलें, मैं बिड़ला जी को देख लेता हूँ।" उन्होंने रहस्यमयी मुस्कान के साथ मुझे विदा किया था।मानव संसाधन विकास मंत्री की अपनी दूसरी पारी (2004-2009) के दौरान अर्जुन सिंह ने दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास के एक महत्वपूर्ण अनौपचारिक अनुरोध को मानने से इंकार कर दिया था। यह अनुरोध भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों को खोलने से सम्बंधित बिल को लेकर था। अमेरिकी दूतावास उसका प्रारूप या ड्राफ्ट देखना चाहता था, लेकिन सिंह ने साफ़ इंकार कर दिया। उस समय शिक्षा सचिव सुदीप बनर्जी हुआ करते थे। 1991-96 की अवधि में भूमंडलीकरण को लेकर खूब शोर था। तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने जुलाई 1991 में आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया शुरू की थी (उदारीकरण, निजीकरण और विनिवेशीकरण)। भूमंडलीकरण को लेकर कतिपय अमेरिकी पत्रकारों और अमेरिकी दूतावास के लोगों ने अर्जुन सिंह के विचारों को जानने-परखने की खूब कोशिश की थी। उनका स्टैंड एक ही रहता था: 'मैं भूमंडलीकरण के विरुद्ध नहीं हूँ, लेकिन इसे भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता की कीमत पर नहीं किया जा सकता है। भारत के आर्थिक हित सर्वोपरि हैं।' क्या इस दौर में किसी भी दल का नेता अर्जुन सिंह जैसी भूमिका निभाने का जोखिम मोल ले सकता है? प्रस्तुत आलेख का उद्देश्य अर्जुन सिंह को निरापद घोषित करना नहीं है। उनकी भी विफलताएं रही हैं। मेरी दृष्टि में, यदि वे 6 दिसंबर 1992 को कैबिनेट मंत्री पद से त्यागपत्र दे देते, तो नया इतिहास बनता। यदि वे 1984 के दिसंबर में भोपाल यूनियन कार्बाइड गैस ट्रेजेडी के वास्तविक मुख्य अमेरिकी अपराधी वारेन एम. एंडरसन (CEO) को 24 घंटों में रिहा नहीं करते और सजा दिलवाते, तो भी नया इतिहास बनता। इन दो मोर्चों पर विफलताओं ने अर्जुन सिंह को इतिहास निर्माता बनने से हमेशा के लिए वंचित कर दिया। फिर भी सवाल तो उठता ही है: क्या कांग्रेस संगठन बहुलतावादी व समाजवादी भारत के प्रहरी अर्जुन सिंह के शून्य को भर सका है? वर्तमान के विषाक्त वातावरण में भी क्या यह सैनिक विलुप्त ही रहेगा?

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भारतीय राजनीति का एक गंभीर व्यक्तित्व: अर्जुन सिंह

विंध्य क्षेत्र, विशेष रूप से रीवा और उसके आसपास का भू-भाग भारतीय राजनीति के इतिहास में एक विशिष्ट और गरिमामय स्थान रखता है। यह क्षेत्र केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वैचारिक रूप से भी अत्यंत समृद्ध रहा है। वैदिक ग्रंथों में विंध्याचल का उल्लेख मिलता है। मध्यकाल में कलचुरी शासकों के पश्चात बघेल राजपूतों ने रीवा को अपनी राजधानी बनाकर एक सशक्त राज्य की स्थापना की। इन शासकों ने कला, साहित्य और संगीत को संरक्षण देकर सत्ता को सांस्कृतिक गरिमा से जोड़ा।इसी विंध्य अंचल ने आधुनिक भारत को ऐसे अनेक नेतृत्वकर्ता दिए, जिन्होंने न केवल क्षेत्र का मान बढ़ाया, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को वैचारिक मजबूती भी प्रदान की। इन्हीं विशिष्ट व्यक्तित्वों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण नाम है कुँवर अर्जुन सिंह। उनका जीवन और राजनीतिक यात्रा लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और जनसेवा की परंपरा का सशक्त उदाहरण है।अर्जुन सिंह का जन्म 5 नवंबर 1930 को रीवा जिले की चुरहट जागीर में हुआ। उनका राजनीतिक जीवन वर्ष 1957 में मध्य प्रदेश विधानसभा से प्रारंभ हुआ, जब उन्होंने युवा अवस्था में निर्दलीय विधायक के रूप में प्रवेश किया। स्वतंत्र चिंतन, जमीनी पकड़ और आम जनता से गहरे जुड़ाव ने उन्हें शीघ्र ही अलग पहचान दिलाई। यह वह दौर था जब राजनीति करना कोई आसान काम नहीं था, उस समय की राजनीति केवल सत्ता-प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि समाज के प्रति गंभीर उत्तरदायित्व के रूप में हुआ करती थी।अर्जुन सिंह जी वर्ष 1960 में कांग्रेस की लोकतांत्रिक विचारधारा से प्रभावित होकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए। चुरहट उनका राजनीतिक गढ़ बना और जीवनपर्यंत बना रहा। वे अनेक बार वहाँ से निर्वाचित हुए। उन्होंने राजनीति को गाँव की चौपाल, खेतों और आम जन की समस्याओं से समझा। किसान, आदिवासी, दलित और वंचित वर्गों की पीड़ा हमेशा उनकी राजनीति के केंद्र में रही। वे सत्ता में रहते हुए भी जनता से निरंतर संवाद बनाए रखते थे। शायद यही कारण था कि जनता ने उन्हें बार-बार अपना प्रतिनिधि चुना और उन पर अटूट विश्वास किया।उनका व्यक्तित्व गंभीर, सधा हुआ और गरिमामय था। वे कम बोलते थे, किंतु जब बोलते थे तो उनके शब्दों में अनुभव और विचार की गहराई स्पष्ट झलकती थी। विंध्य क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता निरंतर जनसंपर्क और ठोस विकास कार्यों पर आधारित रही। सड़क निर्माण, बिजली, पानी, शिक्षा और प्रशासनिक सुधार उनके विकास दृष्टिकोण के प्रमुख आधार थे। उनके प्रयासों से रीवा संभाग एक सशक्त राजनीतिक केंद्र के रूप में उभरा और लंबे समय तक कांग्रेस की मजबूत पकड़ बनी रही। विंध्य क्षेत्र में ओबीसी राजनीति की संगठित शुरुआत का श्रेय भी काफी हद तक अर्जुन सिंह को ही जाता है।मुख्यमंत्री के रूप में अर्जुन सिंह ने दो बार मध्य प्रदेश की बागडोर संभाली-पहली बार 1980 से 1985 तक और दूसरी बार 1988 से 1989 तक। उनके कार्यकाल में विंध्य क्षेत्र, जो दशकों से उपेक्षा का शिकार रहा था, विकास की मुख्यधारा में आया। रीवा, सतना, शहडोल और सीधी जैसे जिलों में उनके द्वारा की गयी स्कूलों और महाविद्यालयों की स्थापना से नई पीढ़ी को आगे बढ़ने के अवसर मिले। उनका विकास-दृष्टिकोण केवल भौतिक संरचनाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक जागरूकता, समान अवसर और न्यायपूर्ण व्यवस्था को भी समाहित करता था।मुझे स्मरण है कि मेरा उनसे पहला पहला साक्षात्कार वर्ष 1971 में हुआ, जब मैं शायद 15 वर्ष का था| उस वक्त मेरे पिताजी जबलपुर उच्च न्यायालय में न्यायाधीश हुआ करते थे और वे नव-निर्मित सीधी जिला न्यायालय के भवन का उद्घाटन करने गए थे और साथ में मुझे भी ले गए थे| उस कार्यक्रम में अर्जुन सिंह जी मध्य प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में विशिष्ट अतिथि बनकर आए थे। कार्यक्रम के बाद वे हमें अपने चुरहट स्थित निवास पर ले गए। वहीं पहली बार मैंने उनकी राजनीतिक विरासत की व्यापकता को निकट से महसूस किया।वर्ष 1978 में मेरे पिताजी के असमय देहावसान के पश्चात मैं जीवन की कठिनाइयों में व्यस्त हो गया|मैंने 1979 में अपनी वकालत की पढाई पूर्ण करने के बाद जबलपुर में अपनी वकालत शुरू की| मैं अक्सर अख़बारों में अर्जुन सिंह जी के बारे में पढ़ा करता था| उस समय सोशल मीडिया के नाम पर केवल अखबार और दूरदर्शन ही हुआ करते थे| अख़बारों में पढ़कर मैंने उनके बारे में अपनी समझ विकसित की और मैं जहाँ तक उनको समझ पाया उनकी एक विशिष्ट विशेषता थी, प्रतिभा के प्रति गहरा सम्मान। वे हर उस व्यक्ति को महत्व देते थे जो अपने क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करता हो, चाहे वह वकील हो, डॉक्टर हो, लेखक हो, कलाकार हो या अभिनेता। मेधावी और कर्मठ लोग उन्हें विशेष रूप से प्रिय थे।डॉ. भीमराव आंबेडकर के आदर्शों से प्रेरित अर्जुन सिंह का यह दृढ़ विश्वास था कि लोकतंत्र तभी सशक्त होता है, जब समाज का अंतिम व्यक्ति भी स्वयं को सत्ता की प्रक्रिया का सहभागी महसूस करे। दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्गों को राजनीति और प्रशासन में प्रतिनिधित्व देने के उनके प्रयास इसी सोच का परिणाम थे।केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री रहते हुए राष्ट्रीय स्तर पर 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण लागू करवाने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही। विशेष रूप से आईआईटी और आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में आरक्षण लागू करना सामाजिक न्याय की दिशा में एक साहसिक और दूरदर्शी कदम था। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को उनके निर्णयों पर भरोसा था|यह उन पर भरोसे का ही परिणाम था कि जब वर्ष 1985 में पंजाब में हालात अत्यंत जटिल थे, तब उन्हें पंजाब का राज्यपाल बनाकर वहाँ की परिस्थितियों को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया|वर्ष 1982 का एक स्मरणीय प्रसंग आज भी मेरे मन में अंकित है। जब मैं जबलपुर से साईखेड़ा (होशंगाबाद) एक सेशंस ट्रायल के लिए ट्रेन से यात्रा कर रहा था, संयोगवश उसी ट्रेन में अर्जुन सिंह जी अपनी धर्मपत्नी श्रीमती सरोज सिंह के साथ भोपाल जा रहे थे। उन्हें जब यह ज्ञात हुआ कि मैं भी उसी ट्रेन में हूँ, तो उन्होंने मुझे अपने डिब्बे में बुलाया और लगभग एक घंटे तक आत्मीय बातचीत की। एक युवा वकील के रूप में मेरे प्रयासों को उन्होंने खुले मन से सराहा। स्वयं विधि के क्षेत्र से जुड़े होने के कारण वे भली-भाँति जानते थे कि वकालत के प्रारंभिक वर्षों में कितनी चुनौतियों और संघर्षों का सामना करना पड़ता है। उनकी अद्भुत स्मरण शक्ति इस संवाद के दौरान स्पष्ट रूप से दिखाई दी| यह गुण उन्हें निकट से जानने वाले सभी लोग स्वीकार करते हैं।इसके बात मेरी उनसे कई बार मुलाकात हुई| वर्ष 1988 में जब वो दूसरी बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो जब एक बार मेरे पिताजी की स्मृति में जबलपुर में मेमोरियल लेक्चर आयोजित होने वाला था, और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायमूर्ति जस्टिस एम्. वेंकटचलैया इस कार्यक्रम में अपना व्याख्यान देने वाले थे| उस वक्त जस्टिस जी. एल. ओझा (जो सुप्रीम कोर्ट के तात्कालिक न्यायमूर्ति थे) और मध्य प्रदेश के तात्कालिक न्यायमूर्ति जस्टिस गुलाब गुप्ता ने सुझाव दिया कि अर्जुन सिंह जी को भी इस मेमोरियल लेक्चर में आमंत्रित किया जाए| अतः उन्हें आमंत्रित करने मैं बाबू चंद्रमोहन जी के साथ उनसे मिलने भोपाल चला गया| वहाँ जाकर पता चला कि वह किसी आवश्यक कार्य से दिल्ली जा रहे हैं, अतः हमने भोपाल एयरपोर्ट ही उनसे मिलना उचित समझा और हम सीधे भोपाल एयरपोर्ट चले गए| भोपाल एयरपोर्ट पर अंततः मैं उनसे मिला और मैंने अनुरोध किया कि मेरे पिताजी की स्मृति में जबलपुर में कार्यक्रम हो रहा है और हम सभी चाहते है कि आप आएं| उस समय यद्यपि वह अत्यंत व्यस्त थे फिर भी उन्होंने मेरे कार्यक्रम हेतु अपनी स्वीकृति दे दी और वह मेरे कार्यक्रम में शामिल हुए|इसके बाद वे दिल्ली आ गए और मैं भी अपनी वकालत में व्यस्त हो गया| इस दौरान मैं कई बार दिल्ली और भोपाल और विभिन्न कार्यक्रमों में उनसे मिला करता था और उनका स्नेह और सहयोग मुझे सदैव मिलता रहा|4 मार्च 2011 को अर्जुन सिंह जी का दुःखद निधन हुआ। आज भी समूचा विंध्य प्रदेश उनके न रहने से उत्पन्न रिक्तता को महसूस करता है। उनका व्यक्तित्व और उनकी राजनीतिक विरासत आज भी विंध्य की राजनीति और भारतीय लोकतंत्र में जीवंत है।अर्जुन सिंह संभवतः भारतीय राजनीति के उन विरल व्यक्तित्वों में से थे, जिन्होंने सत्ता को कभी निजी संपत्ति या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का साधन नहीं माना। उनके लिए सत्ता सदैव संविधान, लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक दायित्वों के प्रति एक गंभीर उत्तरदायित्व रही। आज भी देश का संविधान भवन उनके जैसे गंभीर, संवेदनशील और सामाजिक न्याय के प्रति अटूट प्रतिबद्ध नेतृत्व की कमी को मौन रूप से महसूस करता है।

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अर्जुन सिंह: एक संवेदनशील राजनेता

भारतीय राजनीति में बहुत कम ऐसे राजनेता हुए हैं, जो अपने पीछे इतनी बड़ी विरासत छोड़ गए, जिसे किसी पद से नहीं नापा जा सकता। और ऐसे नेता तो और भी कम हैं, जिनके संसार से विदा होने के वर्षों बाद भी उनके किए काम खुद-ब-खुद उनकी कहानी बयान करते रहते हैं। अर्जुन सिंह जी इस तरह के नेता थे। उनके भू-अधिकार और सामाजिक न्याय के फैसले आज भी अपना असर रखते हैं। इसीलिए अर्जुन सिंह को ऐसे नेता के तौर पर याद किया जाता है जिसने सुविधाओं की नहीं, सिद्धांतों की राजनीति की।मेरा उनसे बड़ा करीबी रिश्ता रहा। यह रिश्ता कई तरह का था— साथ काम करने वाले व्यक्ति का, वरिष्ठ नेता का और सबसे बढ़कर एक ऐसे करीबी साथी का जिसकी जिंदादिली और अटूट नैतिक शक्ति दूसरों को भी इस बात के लिए प्रेरित करती थी कि सार्वजनिक जीवन में प्रतिबद्धता परम आवश्यक है। अर्जुन सिंह को समझने का अर्थ है सार्वजनिक जीवन में नैतिक गंभीरता को समझना। उनका सीधा मंत्र था— सत्ता को हमेशा समाज के सबसे गरीब व्यक्ति के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।एक सच्चा जन नेताअर्जुन सिंह की राजनीतिक शक्ति किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि लोगों के मन की गहरी समझ से आती थी। उनका शासन करने का तरीका कभी जमीन से नहीं कटा। चाहे वह मझोली या सीधी की बात हो या फिर भोपाल और दिल्ली के सत्ता के गलियारे, वह छोटी से छोटी शिकायत के समाधान के लिए उसी गंभीरता से खड़े रहे। मुझे बखूबी याद है कि लोगों के लिए उनकी सहज उपलब्धता सिर्फ सियासी नारा नहीं थी, बल्कि लोगों से जुड़ने की दिली कोशिश थी। वे जिस खुले दिल से मिलते थे, उससे लोगों को लगता था कि उन्हें तवज्जो दी जा रही है और उनकी बात की वजनदारी है। उन्होंने दखल-रहित अभियान से भूमिहीनों और झुग्गीवासियों को जो भू-अधिकार दिए, वह सिर्फ राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि एक नैतिक निर्णय था। उनका मानना था कि स्वाभिमान की शुरुआत स्वामित्व से होती है। जमीन का यह छोटा सा टुकड़ा भूमिहीन को संपत्ति ही नहीं देता, बल्कि पारिवारिक सुरक्षा और आत्मसम्मान भी देता है। ऐसे मामलों में उनका खूब विरोध हुआ लेकिन वे टस से मस नहीं हुए।संकटकाल में मानवीय चेहरानेतृत्व की परीक्षा शांतिकाल में नहीं, संकटकाल में होती है। भोपाल गैस त्रासदी के समय अर्जुन सिंह भारत में हुई सबसे बड़ी दुर्घटना से घिरे हुए थे। मैंने अपनी आंखों से देखा कि उन्होंने प्रशासन को कितनी मुस्तैदी से चलाया और कई बार लालफीताशाही और नियमों को दरकिनार कर पीड़ितों को राहत पहुंचाई। यही मानवीय संवेदना उनके भीतर तब भी काम कर रही थी जब उन्होंने 1983 में फूलन देवी का आत्मसमर्पण करवाया। उनके ऊपर जबरदस्त दबाव था कि वे बल प्रयोग करके दस्यु समस्या का समाधान करें, लेकिन उन्होंने बलप्रयोग की जगह संवाद और गरिमा को वरीयता दी। इसीलिए आत्मसमर्पण का पूरी तरह शांतिपूर्ण होना एक दुर्लभ सफलता थी। इसकी असल वजह यह थी कि अर्जुन सिंह मानते थे कि दुर्दांत से दुर्दांत बागी को भी सम्मान के साथ समाज में लौटने का अवसर दिया जाना चाहिए।सामाजिक न्याय से कभी समझौता नहीं कियाराजनीतिक नफे-नुकसान की परवाह किए बिना अर्जुन सिंह जिस तरह सामाजिक न्याय की प्रक्रिया पर डटे रहे, वह दृढ़ता आज भी प्रशासन को प्रेरणा देती है और नेतृत्व में नैतिक प्रतिबद्धता के गुण का महत्व बढ़ाती है। मुझे याद आता है कि उस समय वे कितने शांत थे। न तो विरोध प्रदर्शन उन्हें उकसाते थे और न ही समझौते उन्हें ललचाते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि समाज के सभी वर्गों की हिस्सेदारी के बिना शिक्षा अन्यायपूर्ण है। 93वां संविधान संशोधन उनके लिए सिर्फ एक विधान नहीं था, बल्कि यह ऐतिहासिक असंतुलन को सुधारने की एक पहल थी। नीतिगत ही नहीं, बल्कि निजी तौर पर भी उन्होंने वंचित समुदाय के छात्रों के हित के लिए बहुत से कदम उठाए। कईयों को तो यह भी पता नहीं होता था कि उन्हें मिल रही मदद के पीछे अर्जुन सिंह का हाथ है। असल में ईमानदार नेतृत्व का सच्चा गुण भी यही है।दूरदृष्टा प्रशासकमध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर अर्जुन सिंह ने हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि विकास संतुलित होना चाहिए— उद्योग लगें, लेकिन शोषण न हो; प्रगति हो, लेकिन विस्थापन न हो। उन्होंने राज्य स्तरीय औद्योगिक फाइनेंसिंग को मजबूत किया, नए औद्योगिक क्षेत्र बनाने को प्रोत्साहित किया, लेकिन साथ ही आदिवासियों के भू-अधिकारों के प्रति पूरी तरह संवेदनशील बने रहे। मुझे कैबिनेट में हुई कई ऐसी बातचीत याद हैं जब उन्होंने कहा कि आदिवासी कल्याण के सवाल पर कोई समझौता नहीं हो सकता। सड़क, बिजली और सिंचाई जनता पर अहसान नहीं है, बल्कि यह न्याय देने के तरीके हैं। इनके जरिए दूरदराज के आदिवासी इलाके न सिर्फ बुनियादी ढांचे से जुड़ते हैं, बल्कि उनके लिए संभावना के द्वार खोलते हैं। उन्होंने कृषि क्षेत्र में फसल विविधीकरण और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की हिमायत तब शुरू कर दी थी, जब बहुत से लोगों ने यह शब्द सुने भी नहीं थे। उनकी दृष्टि साफ थी— किसान को एक फसल या एक सीजन का मोहताज नहीं रहना चाहिए।मध्य प्रदेश में सांस्कृतिक पुनर्जागरणसांस्कृतिक क्षेत्र में अर्जुन सिंह का योगदान लाजवाब है। सन 1982 में मशहूर आर्किटेक्ट चार्ल्स कोरिया से भारत भवन का निर्माण कराकर अर्जुन सिंह ने साफ संदेश दिया— संस्कृति आभूषण नहीं, पहचान है। उन्होंने कलाकारों, लेखकों और मध्य प्रदेश की लोक परंपराओं के संरक्षण और प्रोत्साहन में निजी तौर पर दिलचस्पी दिखाई। प्रदेश में आने वाले मेहमानों को सिर्फ फाइल और फैक्ट्रियां ही नहीं दिखाई जाती थीं, उन्हें आदिवासी कला, कविता और संगीत से भी रूबरू कराया जाता था। उनका मानना था कि संस्कृति सत्ता को शालीन बनाती है।मेरे व्यक्तिगत संबंधअर्जुन सिंह के उत्साहवर्धन के बिना मेरी राजनीतिक यात्रा का बयान नहीं किया जा सकता। मुझे अच्छी तरह याद है कि अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ने से पहले मैं काफी हिचक रहा था। लेकिन उन्होंने बड़े भरोसे के साथ मुझसे कहा, “मैंने इंदिराजी से बात कर ली है। आपको चुनाव लड़ना चाहिए।” उनके इस भरोसे ने मेरे सार्वजनिक जीवन का रुख मोड़ दिया। मेरा और उनका रिश्ता राजनीतिक क्षितिज से कहीं व्यापक है। दशकों तक राजनीति में हमने साथ मिलकर काम किया और हमारे परिवारों के बीच मधुर संबंध बन गए थे।जैसा कि अक्सर लंबे राजनीतिक रिश्तों में होता है, हमारे बीच भी कई बार मतभेद पैदा हुए। लेकिन मतभेद ने एक-दूसरे के प्रति सम्मान को कम नहीं होने दिया। वे ऐसे नेता थे जो दूसरे को खारिज किए बिना असहमत हो सकते थे। यह एक ऐसा गुण है जो आज की राजनीति में मुश्किल से मिलता है।मंत्री के पीछे का मनुष्यअपने गंभीर बाहरी व्यक्तित्व के पीछे एक सहृदय अर्जुन सिंह छिपे रहते थे। उनके हाथ से लिखे नोट्स पढ़ेंगे तो पाएंगे कि उनके पीछे एक विचारशील मस्तिष्क काम कर रहा है, जो स्पष्टता और sincerity की कद्र करता है। उनका मजाक भी बड़ा सौम्य होता था और अक्सर वे खुद का ही मजाक उड़ाते थे। उनका दाऊ-छवि वाला व्यक्तित्व अधिकारबोध को तो निरूपित करता था, लेकिन साथ ही एक गर्मजोशी हमेशा वहां मौजूद रहती थी। अपनी बात पर दूसरों का ध्यान खींचने के लिए उन्हें कभी ऊंची आवाज में बात करने की जरूरत नहीं पड़ी। यह इस बात का द्योतक है कि सच्ची ताकत आवाज की ऊंचाई में नहीं, इरादे की गहराई में मौजूद होती है।अनमोल विरासतअर्जुन सिंह नेताओं की उस पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं जो राजनीति को साध्य नहीं, साधन मानती थी। उनकी विरासत वैसे तो उन संस्थानों, नीतियों और उनके बनाए नेताओं के रूप में मौजूद है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी विरासत यह है कि लोग उन पर किस कदर भरोसा करते थे। उनका स्मरण करते समय हमें यह याद रखना चाहिए कि हर हाल में सत्ता का एक नैतिक केंद्र होना चाहिए। इस तरह के साहस में कई बार आपको अकेले खड़ा रहना पड़ेगा। नेतृत्व का सही माप यह नहीं है कि आपके लिए कितने लोग तालियां बजाते हैं, बल्कि यह कि कितने लोगों पर आपका असर पड़ता है। अर्जुन सिंह ने ऐसा ही असर अपने वक्त और समाज पर डाला। इसीलिए अर्जुन सिंह एक सच्चे जन नेता बने और इतिहास उन्हें इसी रूप में याद करेगा।

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अर्जुन सिंह: राजनीति का एक शालीन चेहरा

आज जब राजनीति में शोरगुल बढ़ गया है और सार्वजनिक जीवन में ध्रुवीकरण बहुत गहरा हो चुका है, ऐसे में चार दशक पीछे—अस्सी और नब्बे के दशक की ओर—देखना काफी प्रासंगिक है। वह एक ऐसा दौर था जब राजनीतिक विमर्श कहीं अधिक सौम्य हुआ करता था और सार्वजनिक जीवन में शिष्टाचार तथा शालीनता एक सामान्य बात थी। उस दौर में वही नेता कद्दावर माने जाते थे जो अपने आचरण से मिसाल कायम करते थे। वे बेहद सरल और सुलभ होने के बावजूद एक प्रभावशाली व्यक्तित्व रखते थे। प्रतिष्ठित श्री अर्जुन सिंह ऐसे ही एक उत्कृष्ट उदाहरण थे।श्री अर्जुन सिंह ने इन दशकों में कई महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं। वे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, पंजाब के राज्यपाल, कांग्रेस पार्टी के पहले उपाध्यक्ष, केंद्रीय वाणिज्य मंत्री, संचार मंत्री और फिर विशेष रूप से मानव संसाधन विकास मंत्री रहे। उन्होंने इन सभी दायित्वों को पूरी कुशलता के साथ निभाया। इसके बावजूद सत्ता का अहंकार उन्हें कभी छू भी नहीं पाया और वे हमेशा एक सरल, विनम्र तथा आसानी से सुलभ रहने वाले व्यक्ति बने रहे।उनके ऐतिहासिक कार्य आज इतिहास का हिस्सा हैं। 1983 में जब वे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने चंबल घाटी के आतंक और कुख्यात डकैत फूलन देवी का आत्मसमर्पण करवाया था। अपने समकालीन वी. पी. सिंह की तरह ही, संभवतः उस समय के विमर्श से प्रभावित होकर, वे भी सामाजिक न्याय के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्पित थे। मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में उन्होंने उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की शुरुआत की। हालांकि उस समय इस फैसले का काफी विरोध हुआ था, लेकिन उनका यह निर्णय समय की कसौटी पर खरा उतरा, क्योंकि बाद में न्यायपालिका ने भी 'क्रीमी लेयर' को बाहर रखने की शर्त के साथ इस अवधारणा को बरकरार रखा।उनके राजनीतिक कौशल की व्यापक रूप से प्रशंसा की जाती थी। उन्होंने अकालियों के साथ शांति वार्ता करने में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मदद की और बाद में राज्यपाल के रूप में पंजाब की उथल-पुथल को भी संभाला। एक चतुर राजनेता के रूप में भारत की राजनीतिक चुनौतियों के प्रति उनकी दृष्टि बहुत दूरदर्शी थी और उन्होंने कांग्रेस पार्टी को इन जटिल मुद्दों से कुशलतापूर्वक बाहर निकालने में अपनी पूरी क्षमता से मदद की।गांधी परिवार के प्रति उनकी गहरी निष्ठा भी उल्लेखनीय थी। उन्हें कभी एक पल के लिए भी इस बात पर संदेह नहीं हुआ कि पार्टी का नेतृत्व उन्हें ही सौंपा जाना चाहिए। वास्तव में, इंदिरा गांधी और उनके उत्तराधिकारियों की सफलता में उन्होंने जो भावनात्मक निवेश किया था, उससे उन्हें तब निराशा भी हुई जब उन्होंने कांग्रेस पार्टी के मूल हितों और सिद्धांतों के प्रति उनकी उदासीनता को देखा, हालांकि उन्होंने कभी इस पर खुलकर टिप्पणी नहीं की।मैं लंबे समय तक इस महान राजनीतिक हस्ती की प्रशंसक और मित्र रही। यह मेरा सौभाग्य था कि मैं उन्हें जानती थी। एक युवा पत्रकार के रूप में, घटनाओं पर उनके दृष्टिकोण को सुनने से मुझे बहुत लाभ हुआ। उनकी जमीनी समझ से मैंने यह भी सीखा कि राजनीति का जुड़ाव हमेशा जमीनी हकीकत से होता है और यह जरूरी नहीं कि यह हमेशा ऊंचे आदर्शवाद से ही प्रेरित हो।चेन्नई, जिसे तब मद्रास कहा जाता था, से 'द हिंदू' समाचार पत्र के लिए देश की राजधानी नई दिल्ली में रिपोर्टिंग करने आई एक युवा रिपोर्टर के रूप में मेरी रुचि राष्ट्रीय राजनीति को कवर करने में थी। और यह बिल्कुल सच है कि 80 के दशक के मध्य में, राजीव गांधी और अरुण नेहरू के अलावा कांग्रेस पार्टी के असली सितारे अर्जुन सिंह ही थे।एक युवा पत्रकार के रूप में, मैं दिल्ली के राजनीतिक दिग्गजों से मिलने के लिए बहुत उत्साहित थी। मैं श्री अर्जुन सिंह जी से मिलने उनके दरबार में गई, जहां उनके प्रतीक्षालय में उत्सुक समर्थकों की भारी भीड़ जमा थी। वे उस समय पार्टी के उपाध्यक्ष थे। मुझे यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वे एक बेहद मिलनसार, हंसमुख और दयालु व्यक्ति थे। उन्होंने दिल्ली की राजनीतिक दुनिया में मेरा स्वागत किया, मेरी पृष्ठभूमि के बारे में जानने में रुचि दिखाई और बहुत जल्दी यह समझ गए कि मैं मुख्य रूप से भारत के राजनीतिक अखाड़े के केंद्र से ज्ञान प्राप्त करने के लिए दिल्ली आई थी।मेरी बहुत जल्द उनके साथ और उनकी आकर्षक पत्नी, बेटों तथा बेटी के साथ भी एक अच्छी मित्रता हो गई। मुझे उनके साथ भोजन करने का सौभाग्य मिला। उनकी पत्नी, हमेशा शालीन रहने वाली श्रीमती सरोज कुमारी एक बेहतरीन मेजबान थीं। मुझे भी कई बार चाय या रात के खाने पर उनकी मेजबानी करने और अपने अन्य दोस्तों से उनका परिचय कराने का अवसर मिला। वे हमेशा उन लोगों के साथ अपने विचार साझा करने में खुशी महसूस करते थे जो मायने रखते थे।लुटियंस दिल्ली की सत्ता के गलियारों में अपनी जगह तलाश रही दक्षिण भारत की एक पत्रकार के लिए श्री अर्जुन सिंह जी एक बहुत बड़ा संबल थे। उन्होंने मुझे कई नेताओं से मिलवाया और उन्हीं की बदौलत मैं न केवल कांग्रेस पार्टी बल्कि पूरे राजनीतिक क्षेत्र की जटिल संरचना को समझने लगी।उनका यथार्थवाद और बुद्धिमत्ता भी उल्लेखनीय थी। वे जटिल राजनीतिक चुनौतियों को इतनी सरलता से हल करते थे कि अक्सर तनावपूर्ण स्थितियां शांत हो जाती थीं। उनके मध्यस्थता कौशल और राजनीति की गहरी समझ ने उन्हें कई अस्थिर स्थितियों में पार्टी तथा सरकार के लिए एक कुशल संकटमोचक बना दिया था।उनका विश्वदृष्टिकोण भी इसी तरह सरल था। साजिशों और दोहरी बातों के लिए उनके पास कोई धैर्य नहीं था। वे मुद्दों को पूरी स्पष्टता के साथ देखते थे। उनके लिए यह बिल्कुल स्पष्ट था कि कांग्रेस पार्टी को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि निर्णय लेने में धर्मनिरपेक्षता और बहुलवाद जैसे उसके संस्थापक मूल्य ही मार्गदर्शक सिद्धांत हों। यही कारण था कि जिस तरह से पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने बाबरी मस्जिद मुद्दे को संभाला था, उससे वे बहुत असहज और अलग-थलग महसूस करने लगे थे।उनके लिए यह देखना बेहद कष्टदायक था कि सरकार ने मामलों को ऐसे ही भटकने दिया। हिंदुत्ववादी और इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा टकराव को बढ़ाने के साथ ही, दोनों पक्षों की ओर से भड़काऊ और उत्तेजक बयानबाजी द्वारा माहौल को जानबूझकर खराब किया जा रहा था।कांग्रेस के मूल्यों, विशेषकर सहिष्णुता और बहुधर्म सह-अस्तित्व के कट्टर आस्तिक के रूप में श्री अर्जुन सिंह को लगा कि प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने पीएमओ के तत्वावधान में बातचीत की अनुमति देकर इस विवाद को एक तरह की वैधता प्रदान कर दी है। उन्होंने कांग्रेस सरकार के स्पष्ट रुख अपनाने में विफल रहने पर अपनी निराशा साफ तौर पर जाहिर की।बाबरी मस्जिद के विध्वंस और उसके बाद इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा की गई जवाबी बमबारी से उन्हें गहरा आघात लगा था और सरकार की इस भयानक विफलता ने उन्हें स्तब्ध कर दिया था। वे जानते थे कि देश एक आपदा की ओर बढ़ रहा है और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में गहराई से धंसता जा रहा है, जो अंततः पूरे नब्बे के दशक को अपनी चपेट में ले लेगा।मैं अक्सर सोचती हूं कि महान राजनेता श्री अर्जुन सिंह आज के भारत को किस रूप में देखते।मुझे यकीन है कि भारत के विकास के प्रति गहराई से प्रतिबद्ध व्यक्ति के रूप में, उन्होंने डिजिटल परिवर्तन में हुई बड़ी प्रगति और अर्थव्यवस्था के तेजी से विकास की प्रशंसा की होती और इसके लिए उन्होंने नरेंद्र मोदी की सरकार को उचित श्रेय देने में भी कोई संकोच नहीं किया होता।यह भी कहा जा सकता है कि कांग्रेस पार्टी का पतन, जो आज एक कमजोर स्थिति में सिमट कर रह गई है और अपने पुराने स्वरूप की एक दुखद परछाई मात्र है, काफी हद तक अर्जुन सिंह जैसे दिग्गजों के चले जाने के कारण हुआ है। वे कांग्रेस के मूल्यों और सम्मान के प्रतीक थे और कांग्रेस संगठन की पुरानी भव्यता की आभा को जगाए रखते थे।राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर भाजपा का निर्विवाद वर्चस्व और एक विश्वसनीय विकल्प की अजीब सी कमी का कारण यह है कि कांग्रेस पार्टी ने उन दिग्गजों को खो दिया है जो पिछले दशकों में मंच पर छाए रहते थे। गांधी परिवार के प्रति अर्जुन सिंह का समर्पण कोई आंख मूंदकर किया गया सम्मान नहीं था, बल्कि यह पार्टी की महान परंपराओं और बुनियादी लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सम्मान था। उनका मानना था कि यह परिवार इन मूल्यों को प्रस्तुत करने और नेतृत्व करने के लिए सबसे उपयुक्त है। जब अर्जुन सिंह को लगा कि नरसिम्हा राव ने पार्टी के प्रमुख मूल्यों के साथ विश्वासघात किया है, तो उन्होंने बगावत कर दी और पार्टी छोड़ दी। श्रीमती सोनिया गांधी के पार्टी के नेता के रूप में उभरने के बाद ही वे वापस लौटे।श्री अर्जुन सिंह ने सज्जन और शालीन राजनेताओं के युग को चरितार्थ किया। वे सभ्य, संस्कारी, चतुर और यथार्थवादी होने के साथ-साथ एक सर्वोत्कृष्ट राजनेता भी थे, जो ऐसे महत्वपूर्ण सौदे और निर्णय लेते थे जो पार्टी को हमेशा परिस्थितियों से आगे रखते थे। एक व्यक्ति के रूप में अपने उच्च पदों और शानदार उपलब्धियों के बावजूद वे विनम्र, सरल और आसानी से सुलभ बने रहे। मेरी राय में, वे कांग्रेस पार्टी के अब तक के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक थे। सही तरह की राजनीति और शासन द्वारा लाए जा सकने वाले बदलाव की अनंत संभावनाओं में उनका विश्वास जितना ताजगी भरा था, उतना ही प्रेरणादायक भी।मैं उस शालीन और स्वागत भरी मुस्कान को कभी नहीं भूल पाऊंगी जिसके साथ वे हमेशा मेरा अभिवादन करते थे, जब भी मैं दिल्ली में बिताए गए अपने वर्षों के दौरान उनसे मिलने जाती थी। वे हमेशा यह सुनना चाहते थे कि किसी भी घटनाक्रम पर मेरे विचार क्या हैं। उन्होंने किसी भी विषय पर कभी कोई अधीरता या चिड़चिड़ापन नहीं दिखाया, बल्कि जो कुछ भी चर्चा हो रही होती, उस पर वे शांति से अपना दृष्टिकोण समझाते थे। उनके साथ हर बैठक के अंत में, मैं हमेशा खुद को अधिक जानकार महसूस करती थी और उभरते हुए किसी भी राजनीतिक या राष्ट्रीय घटनाक्रम की मेरी समझ कहीं बेहतर हो जाती थी।श्री अर्जुन सिंह जैसे राजनीतिक दिग्गजों के चले जाने से भारत निर्धन हुआ है। मैं आज भी उनकी दयालुता, व्यक्तिगत गर्मजोशी और साथ ही उनके स्पष्ट और दूरदर्शी दृष्टिकोण को बहुत याद करती हूं।

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No Conflict Between PM and Sonia

The Union Minister for Human Resource Development, Mr. Arjun Singh, who was a front-runner in the leadership stakes in the Congress earlier and who is today a senior member of the Narasimha Rao Cabinet, is optimistic about this Government’s prospects. He believes that the Government need not feel hampered by its minority status, because when it takes decisions that “cannot be faulted from the point of view of national interest”, there would be little opposition to these decisions.Mr. Arjun Singh explains in a conversation with Malini Parthasarathy the background to the suggestion, which he, among others, had been strongly mooting — that Mrs. Sonia Gandhi become party president. “Soniaji,” he argues, “has a cohesive and uniting role to play.” He also vigorously contends that for Mrs. Sonia Gandhi to play a political role was not at the expense of the position of Mr. Narasimha Rao. As for his own Prime Ministerial ambitions, the answer is a dismissive smile and he demurs: “I have no such illusions.”Excerpts from the interviewQuestion:Now that the budget session is over, this would be the time for the party to consolidate itself. The basic structural weakness of being a minority Government remains. What steps will the Government take to ensure its stability?Answer:I will try to recollect the circumstances in which this Government was formed. The assassination of Rajivji, the resultant trauma and the political void that was created in the Congress party and then the very acrimonious general elections. The Indian polity was never so fractured as it was during the two months of the election campaign.In that background, this Government was formed. So it definitely not only suffers from the lack of a majority, but the effects of all these factors on the national consciousness also have their place in the totality of the circumstances.The first thing was, how to get over the sudden void that has appeared in the political firmament and in the Congress party, because of Rajivji’s assassination. Well, you see ambition is a very common feature of any politician and legitimate also. But I must say to the credit of every single political leader in the Congress party that at that moment of crisis everyone set a limit on his own personal ambition. If that had not happened, the Congress would have disintegrated. And that goes to the credit of the party as a political entity.Secondly, the message that the Indian electorate gave very loud and clear was that in spite of these acrimonious elections, in spite of the communal passions aroused, the electorate decisively negated the communal approach. The BJP increased its strength from 80 to 117. To that extent the BJP has gained. But that it was 117 and not 350 or 255 is the signal point. It showed that the electorate was certainly not in favour of the BJP in a big way. There was no “Hindu wave” coming in.Because all the other people who were elected, apart from the 117, they also derived their support from Hindu, Muslim, Sikhs, all communities. That, I think, is a redeeming feature and in that background, the formation of the Government took place and the challenges that were on the national agenda were taken.The choice of Narasimha Raoji as the leader, as Prime Minister, was dictated by the inner feeling in the Congress party, that he is the best among the seniormost, perhaps the most acceptable. All these factors, they were weighed and valued and everyone thought that this was the best thing to do. Having elected him as Congress President, it was natural for him to become Prime Minister.To the extent, I can see, there was no focus of any kind of dissidence or dissatisfaction, which could be fanned into something politically damaging. That is why in spite of all the forebodings expressed, this Government could not only survive this Parliament, but also take some very bold decisions.Question:Why did the Congress Working Committee suggest Mrs. Sonia Gandhi? In a sense, there was a delayed acceptance of the choice of Mr. Narasimha Rao.Answer:I was one of those who had suggested this. Naturally you would like an explanation from me and that explanation should be cogent.What is the relevance of the suggestion to make Mrs. Sonia Gandhi the party president? I do not deny that there was an emotional element to the suggestion and the fact is that for the last 35 years of my political work, all these 35 years barring the one year when I was an independent MLA, I have been in the Congress working with Panditji, Indiraji and Rajivji and I am proud of it.The second thing was, according to my judgment, the sudden void that was created, there was a risk of people suddenly becoming totally directionless and, as happens in such moments, advantage is taken of by people who are inimical to the Congress and, if I may say so, I must say even at the risk of getting a lot of criticism, that for the time being, the unity and relevance of the Congress party are directly related to the unity and relevance of the Indian nation.The unity and relevance of the Congress party have become coterminous with the unity and integration of the country. If the Congress had disintegrated at that time or if it disintegrates even now, there will be serious repercussions in the country.So it was my feeling that she, Sonia Gandhi, would be a tremendous cohesive force, first in the Congress party. If the Congress is united and strong, only then will it be able to discharge its responsibility outside.I felt then and I tell you I feel even now that in the Congress party, Soniaji has a cohesive role to play, a uniting role to play then and even now. Everyone agreed to it, but she turned it down and I think her turning it down elevated her status.Question:Don’t you feel that the possibility that she might at any time step into the ring weakens Mr. Narasimha Rao’s political authority?Answer:That can be relevant to the situation only if you feel or believe that there is some inherent conflict between Narasimha Raoji and Soniaji.Question:There would definitely be parallel power centres in the party...Answer:The power centres would be if only Mr. Narasimha Rao considers her as a threat or if she wants to usurp the powers of Mr. Narasimha Rao. When both do not exist, then how can that happen? I believe that both of these things won’t exist. Yet she remains a cohesive force or uniting force.Question:One element of your party’s recovery would involve reviving its support in the Hindi heartland. Do you think the party needs to project a leader from the Hindi belt?Answer:No, no. It is not the question of north and south. You see, the Congress organisation has had great presidents from the south. But the Congress has never thought in terms of north and south as a party and all the presidents that came from the south, they have never been inhibited in their day-to-day activity in getting their support or the full backing of the Congress in the north.But in the new circumstances that have risen post-elections where the Congress has been routed in the north, what do we do? That is a very pertinent question.I don’t think the conferring of leadership is the only way out. We have elected a leader so there is no question of now electing somebody else to take care of the Congress. Now we should go very carefully about what is needed and what has gone wrong and if there has been an erosion in the base or in the confidence that the Congress enjoyed in these areas from those people who were traditionally in the party, the Harijans, the minorities, the backward. What has gone wrong and that wrong has to be corrected not by speeches alone.Question:Wasn’t such an exercise undertaken after the 1989 defeat?Answer:It was begun in 1989 and it had an effect, but not to the extent that all of us wanted.Question:On the two key issues in the politics of the Hindi belt, Ayodhya and Mandal, has the party come to any conclusion as to how the treatment of these issues affected its election prospects?Answer:Both the issues must be met squarely. There cannot be equivocation. I think we suffered because some of us were equivocal and whenever — I am not letting out a secret — this is known. Whenever Rajivji wanted to be clear and categorical, some amongst us would advise him against it and that the net result would be that it would appear as if the party is equivocal. We had suffered because of that.Question:Do you have in mind the party’s support to the Mulayam Singh Yadav Ministry?Answer:No, I am not relating it to any individual. We are talking of the crux of the issue. Now at the moment, what is required is that on the Ayodhya issue, it should be very clearly understood that the Congress party is for the building of the Bhagwan Ram temple. When in reality, this was so, the impression went that we were against the building of the temple. Why, because we approached the matter with some equivocation.Question:Well, there was certainly a feeling that with the Shilanyas the Congress was pitching for the Hindu vote.Answer:Yes, because again the equivocation took its toll. Building a temple does not necessarily mean demolishing a mosque. And if the question of any demolition is to be taken up, then there are ways how to arrive at a conclusion about it. It has either to be by mutual consent or discussion, consultation or, as it happens in all civilised countries, through a judicial process.On the issue of reservations, now here again while the Congress party has in fact initiated the concept of reservations for backward classes, we have been made to look as if we were totally opposed to the idea of reservation. Here again, I think we made some mistakes. And here again Rajivji time and again wanted to correct it and I am saying this without any fear of contradiction.So on this subject, Rajiv Gandhi never wanted to be against the concept of reservation and he only thought that the element of backwardness among the backward classes should also be a factor. And since it also has an economic content, even those people who do not fall under the castes enumerated as backward, that is people from the upper castes also, who are in their economic category, should also get some benefit in the process. Now this we could not put across.Question:You have been at the helm in Madhya Pradesh, a State where the BJP is a force. In your opinion, how has the BJP emerged as a major political presence?Answer:The reason why the BJP has suddenly come up should be answered after taking a total view. You cannot answer this question constituency-wise and you cannot answer this State-wise.See, so long as there were issues in the public mind which related to matters concerning the country, the community at large, the socio-economic scene, the Congress ideas or for that matter, even the Leftist programmes were the deciding factors for making public policy.Now as soon as there was a slight unfocussing of these issues, then in public life there is never a vacuum. The BJP had never had any programmatic approach to the country’s problems. So they very cleverly took the opportunity of this vacuum and filled it with caste and communal and religious issues.The BJP has no fixed national perspectives to guide the nation, they have to fall back on emotional issues, whether it is religion or it is Article 370 in Kashmir or whatever else it may be.Question:In your opinion, what should be done to refocus national priorities? How can the threat of religious chauvinism be handled?Answer:We have to again focus the nation’s attention on the socio-economic issues, on the political issues, on our international position. What we want this country to do and where we want it to go. All this has to be brought back into focus and then automatically and gradually this issue will be marginalised.If we attach the same importance to it that they are attaching, then this debate will go on endlessly. We have strong attachments to regional and local affinities. There is hardly any area in this country which cannot look back nostalgically and proudly on its past and conceive of itself as being the centre of a great civilisation. In this you mix religion which becomes more potent and more dangerous also.We have to get out of that frame of mind. India now is a modern country. We are proud of the Moghul Empire, we are proud of the Kalinga Empire, we are proud of the Marathas and we are proud of the other great political entities that have gone in the past. But they cannot become the focus for present greatness.So secularism is not only the question of between Hindu, Muslim, Sikh or Christian. It is what is our loyalty to. Our loyalty has to be to the country. Then only do we become Muslims, then we become Hindus, then we become Christians. Otherwise, those sub-loyalties all go to feed and add to the basic concept of fundamentalism.As long as you go on dividing the basic loyalty of a citizen towards his country and you condition it with these sub-loyalties you are in fact helping fundamentalism.Question:Given these basic challenges to our national identity as, for instance, the attack on a secular political ethos, is there not a need for a realignment of political forces on a secular platform?Answer:I think it is a little premature to predict the pattern that is going to emerge in the near or distant future about the political realignment. But this much is now very clear. That all parties in which I include the Congress party also, have to think or rethink over their policies, programmes and principles which they have been pronouncing so far.First, about the relevance of those things to the present context in the country. Secondly, as to whether those perceptions that grew out of those programmes and policies are at the moment adding or subtracting to the building up of a national identity. And thirdly, how those principles, programmes and policies are to be used to convert our stagnant industrial situation in the country.I think, that kind of thinking is bound to take place, but what it will result in, frankly speaking, I am not in a position to say.Question:The economic reforms that have been brought in are certain to raise some concern over whether these may be at the expense of distributive goals. There was some discussion within the Congress also. Are you not worried that the new economic approach could have an adverse impact, politically speaking?Answer:Well, I must confess very clearly that I am no great economist. But as a public worker I can answer this question. Let us look at it rationally. I don’t think that there is anybody in the Left, who would support the idea that India should lag behind in becoming a strong industrial nation, producing the wealth that it needs for the present and also for investment in the future.There can’t be any doubt on that. The question is how do we go about it. At the time when we became free, we lacked both infrastructure, capital, and also perhaps the expertise. And in that situation, the first industrial policy was formulated by Panditji.It is very obvious that in that policy resolution these three things were addressed by him. That they were addressed in the correct way was borne out by the fact that where we started in 1947 and where we are today in 1991, I think even the worst cynic and sceptic will have to concede that India went forward and did not go backward.That we went forward and have arrived here proves that the first postulates were correct. Because we are a poor country and because certain elements could have taken advantage of the socio-economic disparities to enrich themselves at the cost of the community, a lot of safeguards, regulations and controls were built into the system of industrialisation.Indiraji started removing many of the regulatory functions which had become redundant. Now with this latest decision, we have taken a step which is required at the moment to further propel the industrialisation of this country.Now unless we produce wealth, the distributive part will become almost an illusion. Now on the distributive part, I am quite clear in my mind that for a long time to come in India, the State will have to play a very decisive and crucial role in seeing that the distributive part is taken care of in such a manner that the weaker and poorer sections of the community get the maximum potential.Question:On Punjab, with President’s rule being extended again, is there hope of any political process being initiated? Your Government has promised elections by next February. But meanwhile, what about steps like reviving elements of the Rajiv-Longowal accord?Answer:I think in Punjab, what is missing today is mutual faith and trust. The Rajiv-Longowal accord means a lot of things in terms of paras and sentences and commas and full stops. But the whole thing that is underlined is mutual trust.If Sant Longowal had no faith in Rajiv Gandhi or Rajiv Gandhi had no trust in Sant Longowal, that accord would have never seen the light of the day. And mind you, this happened almost in the aftermath of Bluestar, almost under the shadow of Bluestar Operation.So whoever feels that he has to contribute something to the Punjab solution, the first thing should be to contribute to the building of this trust and faith.Question:Postponing elections was hardly conducive to building trust...Answer:I don’t think that was the right thing to do. But it was done under circumstances which, perhaps could not be avoided. But now we have set a deadline and I think the Prime Minister is quite clear and we are also quite clear that there cannot be any more dragging on this non-election situation.Question:If a realignment of forces does not take place and you do not get a majority, how will your party be able to ensure the stability of this Government?Answer:You see, we cannot go by mathematical standards in achieving political ends and I think to say that we should get rid of our minority status and only then things will happen, well, time is not going to wait for it.Secondly, we need not be hampered or totally limited by our minority status from doing what we think is right and correct for the country. And I think we will succeed if we are able to take decisions in a manner which cannot be faulted from the point of view of national interest.Then even if there are some differences, they will be reconciled. Because everyone will ultimately see what the national interest is.Question:Are you an aspirant to become the Prime Minister? You were a front-runner earlier. You did say earlier that it was legitimate to have political ambition.Answer:I can become a prime target by having such illusions. Therefore, I don’t entertain these illusions at all.“Contender” presupposes two things. One that there is something to contend for. Secondly, that I consider myself as eminently suited or as the only person who can fit that.First, there is nothing to contend for. Because we have a Prime Minister whom we have all joined together to elect and all of us with our limited capacity are committed to help him to run the country. I am very insignificant, but I would like to be a part of the effort.Secondly, I think there are many more people more eminently suited than me to hold this office. The question of having an ambition is not wrong. But to have a vaulting ambition which overlooks the realities of the situation can be the cause of great tragedy as it has happened.Once you feel that you are being denied or deprived then processes are set in motion which are not only undesirable, unwanted, but I think, dangerous to the country’s interest and the party’s interest. I am not interested in that kind of process. I don’t feel deprived or denied of anything.Question:Could you be considered a Prime Minister-in-waiting then?Answer:No, I think as I told you, that germ that enters your mind that is the destructive germ. That is what I am trying to tell you. And so far, I have been able to keep the germ out of my mind, I have no intention to allow it to enter my mind now.

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