आम मान्यता है कि कुशल राजनीतिज्ञ भावना नहीं, योजना में यकीन रखते हैं पर मैंने अर्जुन सिंह को मुझे अपनी स्नेहिल छाया देते पाया। इस बिन्दु को विस्तार देने के लिये एक स्मृति पर्याप्त होगी। एनसीईआरटी लगातार विवादों और सुर्खियों से जूझती रहती थी। इसलिये मुझे चौकन्ना बने रहने और रोजाना किसी नई मुसीबत से गुज़रने की आदत हो गई थी। फिर भी जब तीसरे साल में हिन्दी की नई पुस्तकों पर संसद में हुए हंगामे की खबर आई तो मैं हैरान और काफी परेशान हो गया। संदेश आया कि शाम को मंत्री जी ने घर पर मिलने को कहा है। अगले दिन संसद में दोबारा चर्चा होनी थी। मैं घर पहुंचा तो रोज की तरह दर्जनों लोग इंतजार कर रहे थे। आठ बजे मुझे अंदर वाले कमरे में बुलाया गया। वहाँ भी दो-चार लोग पहले से बैठे थे। कुछ देर में अर्जुन सिंह अंदर आए और दरवाजे में एक क्षण खड़े होकर मेरी तरफ देखकर अंग्रेजी में बोले -"सो यू आर अगेन इन ट्रबल" उनके होठों पर क्षीण सी मुस्कान थी- फिक्र मत करो हम संभाल लेंगे। अगले दिन राज्य सभा में पाठ्यपुस्तकों की चर्चा की बारी आते आते रात के दस बज चुके थे। दिन भर बैठे-बैठे यह अहसास मेरे मन में गहराता गया था कि शिक्षा के किसी भी पहलू पर शांति से बहस करना संसद के बस की बात नहीं है। जिन रचनाओं पर आपत्ति उठाई गई थी वे प्रेमचन्द, धूमिल, पाण्डेय, बेचन शर्मा "उग्र", जगदीश चंद्र माथुर, पांश और ओमप्रकाश वाल्मीकी कि जैसे साहित्यकारों की थी। चित्रकार हुसैन की जीवनी पर भी आपत्ति थी। कुछ रचनाओं पर उठाई गई आपत्तियाँ चंद पंक्तियों या शब्दों को लेकर थी मानो साहित्य में संदर्भ और अर्थ या व्यंजना का कोई महत्व न हो। मेरे सहयोगी रामजन्म शर्मा ने एक एक आपत्ति का उत्तर तैयार किया था, पर मेरे मन में पूरी चर्चा की शैली से उठा गुबार शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। चर्चा क्या थी एक अंधड़ था जिसमें बड़े-बड़े नेता आधी-अधूरी जानकारी और समय के आधार पर जो मर्जी कह चुके थे। वामपंथी नेता सीताराम येचुरी ने आवेश में कहा था- गुनहगारों को सजा मिलनी चाहिये। लंबी इंतजार के बाद रात दस बजे के बाद जब उत्तर देने के लिये अर्जुन सिंह खड़े हुए तो वे एक धैर्त्यवान, शांत योद्धा जैसे लग रहे थे। सदस्यगण जोर डाल रहे थे कि हिन्दी की पुस्तकों की जाँच एक संयुक्त संसदीय समिति करें। अर्जुन सिंह काफी देर तक एक एक आपत्ति का उत्तर देते रहे एक-दो बार उन्होंने संयत व्यंग्य का सहारा भी लिया। अंत में अपनी वरिष्ठता की गरिमा के साथ निर्णायक स्वर में बोले कि संयुक्त संसदीय समिति की कोई आवश्यकता नहीं है; वे स्वयं एक जाँच समिति बनाएंगे। सभा चुप रही। आधी रात होने को थी। मैं उनका यह शांत दृढ़ रूप पहले भी कई बार देख चुका था। एनसीईआरटी में मेरे शुरूआती
महीने में कार्यकारिणी की बैठक हुई थी। अभी नई पाठ्यचर्या और पाठ्यपुस्तकों की रचना का काम काफी दूर था और इतिहास की किताबों पर आक्रमणों का सिलसिला जारी था। कार्यकारिणी की बैठक के ठीक बाद साधारण सभा की बैठक में की चर्चा करते हुए भाजपा शासित राज्यों के शिक्षामंत्री इतिहास की पुस्तकें दोबारा लाए जाने की संभावना के विरोध में बाहर चले गए। इस बीच अर्जुन सिंह ने रामजन्म शर्मा को इशारा करके उन्हें कोई सूचना लाने को भेजा। सभा के समापन से पहले वह सूचना आ चुकी थी। अपने समापन वक्तव्य में तुलसी दास की यह चौपाई संख्या और संदर्भ देकर सुनाई "भये प्रगट कृपाला दीन दयाला, कौशल्या अधिकारी"। चौपाई सर्वपरिचित थी पर अर्जुन सिंह ने उसकी व्याख्या करके सबको चौका दिया। प्रगट का अर्थ समझाते हुए वे बोले कि राम के जन्म को किसी खास जगह से जोड़ने वाले उनके अलौकिक रूप को नकारते हैं अर्थात् भगवान राम प्रगट हुए थे किसी सामान्य शिशु की तरह नहीं जन्मे थे।
कुछ समय बाद जब नई राष्ट्रीय पाठ्यचर्या बनाने की तैयारी शुरू हुई तो यह अफवाह फैली कि मैं अपना प्रत्येक निर्णय मंत्री जी के इशारे पर ले रहा हूँ। एक विशद प्रक्रिया के तहत हर विषय के अग्रणी विद्वान पाठ्यचर्या के निर्माण में उत्साह से अपना समय लगा रहे थे, फिर भी अफवाह जारी रही। मंत्रालय की सिफारिश पाने के इच्छुक लगातार दबाव बनाने की कोशिश करते रहे। एनसीईआरटी के कामकाज में योगदान देने के इच्छुकों या किसी खाली पद पर नियुक्ति के उम्मीदवारों ने सिफारिश प्राप्त करने के लिये क्या नहीं किया होगा, इसकी कल्पना मैं कर सकता हूँ। ऐसो ही एक दिन मेरे आफिस में फोन कराके एक सज्जन स्वयं आ पहुंचे। वे मिलने की प्रतीक्षा कर रहे थे कि बीच स्वयं अर्जुन सिंह का फोन आया कि ये सज्जन गुहारो मिलना चाहते थे, अतः मैं मिल लूँ उनकी बात सुन लूँ, यही काफी हो है। इस सच्चाई को आज भी कोई मानने को राज़ी नहीं है, कि मेरे पाँच वर्ष के कार्यकाल में एक बार भी अर्जुन सिंह ने मेरे काम या मेरी संस्था में किसी भी किसम का हस्तक्षेप नहीं किया न कभी कोई राय दी, दबाव का तो सवाल ही नहीं था। जैसा उन्होंने गुहारो पहले दिन कहा था वही अंत तक राज बना रहा : "एन एनसीईआरटी जिन उद्देश्यों के लिये बनी थीं उन्हें पूरा कीजिए।"
एक बार भोपाल के रीजनल इन्स्टीगूट में काम कर चुका चपरासी दिल्ली पहुँचा। वह मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी से अपनी गुहार की अनुशंसा लेकर अर्जुन सिंह के पास आया था। उसका दावा था कि कुछ वर्ष पहले रीजनल इन्स्टीगूट ने उसके साथ अन्याय किया था। उसकी द्वारा शिकायत की जाँच एकदो बार हो चुकी थी पर अन्याय का कोई पगता नहीं मिला था। अबकी बार वह सीधे मंत्री जी के पास जा पहुंचा था। मंत्रालय ने एनसीईआरटी के सचिव (जो सत्य आई.ए.एस से संयुक्त सचिव के पद पर थे) को फोन किया था जो
कि वे सारी फाइलें लेकर मंत्री जी के कार्यालय पहुंचे। मुझे साथ में आने के लिये संदेश आया। हम दोनों नियत समय पर अर्जुन सिंह के कार्यालय में दाखिल हुए तो देखा कि चपरासी पहले से वहाँ मौजूद था। उसके सामने अर्जुन सिंह ने पूछा कि क्या पिछली जाँच के सारे कागज़ ठीक से देख लिये गये हैं। मेरे साथ आए सचिव ने फाइलें दिखा कर कहा कि आज ही उन्होंने पूरे कागज़ जांचे हैं और कहीं कोई कमी नहीं पाई है। एक दो मिनट बाद अर्जुन सिंह ने कहा-
"ठीक है आप लोग जाइये।" चपरासी भी मेरे साथ बाहर आ गया। मेरे सचिव कुछ उलझन में थे अतः दोबारा अंदर गये और मंत्री जी से बोले-" सर कुछ करना है?" जवाब मिला- "नहीं।" फिर थोड़ी देर रुककर बोले- यदि आप उसकी जगह होते तो आप भी यही करते।
अर्जुन सिंह की प्रशासनिक शैली निराली थी। बहुत कम शब्दों में बहुत सोचकर अपनी बात कहते थे। घंटों तक धीरज के साथ सबकी बातें सुनकर अंत में कुछ कहते थे- सधे नपे तुले मगर महत्वपूर्ण विवरणों के साथ। मैंने कई बार उनके वैचारिक अन्तरजगत की गहराई का व्यक्तिगत अनुभव किया। प्रोफेसर यशपाल जो चोटी के अन्तरिक्ष वैज्ञानिक थे और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रचना के मार्गदर्शक थे कई बार मुझसे कहते थे कि अर्जुन सिंह जैसे नेता उन्होंने बहुतै कम देखे हैं। बुद्धिजीवियों, कलाकारों, साहित्यकारों और विद्वानों के संग बातचीत में अर्जुन सिंह की सहृदय जिज्ञासा सहज दिखाई देती थी। राजनीति के बीहड़ में वे कई बार अकेले दिखलाई देते थे। मेरा सौभाग्य ही था कि मुझे अनायास उनका स्नेहिल संरक्षण एक कठिन प्रशासनिक जिम्मेदारी को निभाते समय मिला।