हृदय की शल्य-क्रिया से पूर्व श्री अर्जुनसिंह द्वारा लिखा पत्र

यह वह पत्र है जो 22 अक्टूबर 1990 को एस्कॉर्ट हास्पिटल में, हार्ट ऑपरेशन के लिये ऑपरेशन थिएटर में ले जाने और एनेस्थीसिया दिये जाने से पूर्व श्री अर्जुनसिंह ने स्वयं अपनी क़लम से लिखा था। यह पत्र श्री अर्जुनसिंह के जीवन, विचार, कल्पना, साधना, तपस्या, राष्ट्रभक्ति, समाजकल्याण, धर्म, पंथ, पूजा और प्रभु के प्रति उनकी साधना और भावना का दर्पण है।

मेरे राम, रहीम और ईसा तुम कहॉ हो?

राम, तुम्हारी कृपा का आभास तो सब से पहले अपनी मॉ की गोद में हुआ। तुम्हारे गुणों से प्रेम, करूणा, वात्सल्य, अनुशासन, कर्तव्यपरायणता और आसुरी शक्तियों से संघर्ष करने के असीमित साहस से। तस्वीर तो पॉच-छह वर्ष की उम्र में देखी जब संत तुलसीकृत रामायण देखने और सुनने का अवसर मिला। बाल राम, युवा राम और योद्धा राम- तीनों मूर्तियों का ओज और आत्मबल समान था और देश के करोड़ों हिन्दुओं की भॉति मेरे भी मानस पटल में सदैव सदैव के लिये अंकित हो गई लेकिन मॉ की गोद में अवगत हुये गुणों से उन्हें कभी अलग नही कर सका।

सात बरस की उम्र में शिक्षा के लिये प्रयाग के सेंट थेरिस कैथोलिक कान्वेंट में बोर्डर की हैसियत से भर्ती होने पर दिनचर्या के रूप में प्रातः गिरजाघर जाना और प्रार्थना करनी पड़ती थी। बहुत आश्चर्य हुआ, भगवान ईसा मसीह को क्रॉस पर टॅंगे देखकर और कुछ दुःख भी हुआ कि जिसे भगवान का इकलौता पुत्र मानते है उन्हें ऐसी यातना क्यों सहनी पड़ी? भगवान जो सर्वशक्तिमान है, उन्होंने अपने पुत्र की रक्षा क्यों नही की? धीरे-धीरे ज्ञान हुआ कि ईसा मसीह भी क्रॉस पर उन्हीं गुणों के पालन व रक्षा के लिये चढ़ाये गये जिनके अनवरत पालन से राम को मर्यादा पुरूषोत्तम कहा गया। भावना व भक्ति का अटूट मिश्रण हुआ और आत्मबल का प्रादुर्भाव हुआ।

इस्लाम धर्म के बारे में उर्दू पढ़ाने वाले मौलवी साहब से जानकारी मिली, लेकिन जब उन्होंने कहा कि मैं आपको अल्लाह ताला की कोई तस्वीर नही दे सकता तो मुझे लगा, किसके नाम या आकार के सहारे पवित्र कुरान शरीफ पढ़ा जा सकता है। उन्होंने मुझसे कहा-आप एक दफे इस्लाम की कुछ मौलिक बातें पढ़िये तो। गुरू की आज्ञा समझकर मैंने पढ़ा। ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता गया, लगा कि यह सब तो वही है जो राम व ईसा से जुड़ी बातें हैं, गुण हैं। मौलवी साहब से तो मैने यह बात नही कही, इस संकोच में कि कहीं उन्हें नागवार न गुजरे लेकिन जो हमारे निजी गार्जियन पं. बृजवासी लाल पांडे जी थे (जो दुर्भाग्य से अब नही हैं) उनसे मैंने जरूर कहा कि इस्लाम धर्म के प्रति श्रद्धा व समर्पण की भावना कैसे जागृत की जा सकती है जब इस धर्म के आदिपुरूष का मानवीय स्वरूप ही देखने को नहीं मिलता। पंडित जी ने जो उत्तर दिया उसने मुझे अपनी भारतीय विरासत का विराट दर्शन कराया और धर्म क्या है, उसको सही रूप में समझने का अवसर दिया। उन्होंने कहा- प्रत्येक धर्म आस्था, विश्वास और कर्मठता का सुन्दर समन्वय हैं। हिन्दू धर्म आस्थाओं का पुंज है, ईसाई धर्म विश्वासों की कसौटी पर खरा उतरने का अलौकिक अवसर है और इस्लाम धर्म कठिन से कठिन परिस्थितियों में कर्मठता का प्रमाण देने का माध्यम हैं।

कोई भी व्यक्ति अपनी निजी मान्यताओं व आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये चाहे जो गढ़ता व बुनता रहे लेकिन इनके बाहर जाकर धर्म का पालन नही कर सकता है। यही उन्होंने कहा- गीता में भगवान कृष्ण का अंतिम उपदेश है।

इस घटना को हुये 45 वर्ष बीत गये लेकिन आज भी एक-एक शब्द और उसका अर्थ मेरे हृदय पटल पर केवल अंकित ही नहीं है बल्कि मैंने इसी को अपनी समृद्ध विरासत व धरोहर मानकर जीवन के अनेकों उतार-चढ़ाव पार किये। मंदिर हो, मस्जिद हो, गिरजाघर हो या गुरूद्वारा हो, कहीं भी परमात्मा के दयालु, करूणामय व स्थितप्रज्ञ दर्शन करने में मुझे कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई।

आज इस समृद्ध विरासत के बिखरने का खतरा उत्पन्न हो गया है। विडंबना यह है कि वह खतरा उन्हीं धर्मों के माध्यम से पैदा किया जा रहा है जिनके पाक सिद्धान्तों से यह सदियों में निर्मित हुआ था। युग पुरूष महात्मा गॉधी के चरण स्पर्श करने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ था। राष्ट्रनायक पंडित नेहरू के तेजस्वी हाथों ने मेरे कंधों को स्पर्श करके संघर्ष और बलिदान से उत्पन्न अजेय ऊर्जा को मुझमें स्थानांतरित किया था, जिसके बल व प्रेरणा से राष्ट्रमाता श्रीमती इन्दिरा जी के संघर्षशील नैतृत्व में कई उत्तेजक क्षणों को अनुभव करने का अवसर मिला और आज भी देश की महान संस्था कांग्रेस में राजीव जी के अनुशासित सिपाही की हैसियत से सेवा व संघर्ष के अनवरत अभियान में लगे रहने की शक्ति मिली।

सहसा दिन- 5 अक्टूबर को मध्यान्ह इस सब पर विराम लगता दिखा- लेकिन प्रभु कृपा से ऐसा हुआ नहीं। आज सुबह मुझे बताया गया कि मेरे हृदय की शल्य चिकित्सा करनी पड़ेगी। कोई भी शल्यक्रिया चिन्ता का विषय बना जाती है, फिर हृदय की शल्य चिकित्सा तो होनी हीं चाहिए। हर मनुष्य के नाते मुझे भी थोड़ी चिन्ता है, लेकिन मुझे अंदर से प्रेरणा मिली कि कुछ जीवन का लेखा-जोखा भी तो कर डालो। एक तो व्यक्तिगत लेखा-जोखा होता है, उसमें मेरी दिलचस्पी बिलकुल नहीं है। उसे करने वाले दोस्त व दुश्मन दोनों काफी है, इसलिये सही ही होगा।

आज इन क्षणों में- इसके पूर्व कि बेहोशी दे दी जावे, मैं केवल राम, रहीम और ईसा को खोजना चाहता था और पूछना चाहता था कि कहॉ हो जो मेरा प्यारा देश बिना पतवार के नाविक के सहारे इतिहास के भंवर की ओर तेजी से बढ़ता जा रहा है। राम, तुम्हारे भक्तों की संख्या तो असंख्य है, उसमें निषादराज भी है- शबरी भी है और संत तुलसीदास भी है। लेकिन आज के इन भक्तों में तो ये आदर्श नहीं रहे। आज के इन विख्यात भक्तों ने यह भी नहीं सोचा कि आपने तो आसुरी शक्तियों के भयंकर प्रतीक रावण से बिना रथ पर बैठे ही संग्राम करके उसे पराजित किया- आधुनिक भक्तों ने तो आपके नाम से रथ बनाकर, उस पर विराजमान होकर दिग्विजय के लिये निकल पड़े हैं। और वह भी विजय किसी आसुरी शक्ति के ऊपर नहीं, बल्कि अपने ही देशवासियों के ऊपर। उन्हें कौन बताए कि संत तुलसी को रामचरित मानस रचने के पश्चात इनाम के बतौर अकबर ने मनसबदारी और बहुत सा धन उपहार में भेजा था। संत तुलसीदास का अकबर को उत्तर था-

‘‘हम चाकर रघुवीर के, पटो लिखो दरबार।
अब तुलसी का होहिंगे, नर के मनसबदार।।’’

परन्तु प्रभु आज के रामभक्त तो नर क्या, पिशाचों की मनसबदारी करने को तत्पर हैं।

मेरे अल्लाह, आज कर्तव्य की, कर्मठता की कसौटी पर उतरने को बेताब होने वाले तुम्हारे भक्त अपनी आवाज की बुलंदगी को नाप रहें है- शायद कबीर के उस दोहे से वे परिचित नहीं है-

‘‘चींटी के पग घुंघरू बाजे तो तेरा मालिक सुनता है।
ऊपर चढ़कर बांग लगाए, क्या तेरा मालिक बहरा है।’’

आवाज की बुलंदगी नहीं, उसकी गहराई की वकत होनी चाहिए।

मेरे ईसा मसीह! अपनी असीमित करूणा और विश्वास से उपजा दृढ़ संकल्प का अथाह सागर मेरे भारत में उड़ेल दो ताकि घृणा और द्वेष की धधकती ज्वाला शांत हो जाये और हम अपने गौरवमयी इतिहास की यात्रा निरंतर जारी रखें। कोई भी धर्म व विश्वास राष्ट्रधर्म के पीछे आता है, यह हमारी परंपरा रही। बाणों की शय्या में लेटे भीष्म पितामह ने अपने आखरी उपदेश में यही तो कहा था कि जब कभी देष के बॅंटवारे का सवाल आ जाये तो राष्ट्रधर्म का पालन करने के लिये कुरूक्षेत्र में आना ही पड़ेगा। मुश्किल यह है कि आज पाण्डवों व कौरवों की सेना अलग-अलग नहीं, बल्कि मिल-जुल गई है। कौन लड़ेगा जब हर ऑगन को लोग कुरूक्षेत्र बनाने पर तुले हुये हैं।

केवल राम, रहीम और ईसा की संयुक्त कृपा ही यह संभव कर दिखा सकती है। भगवान राम! मैं भी बजरंग दल का एक अकिंचन सदस्य हूॅ लेकिन उस बजरंग दल का नहीं, जो त्रिशूल और नंगी तलवारों से माताओं और बहनों को आतंकित करते हैं। मैं आपके अनन्य भक्त बजरंगबली के दल का हूॅ जिनका एकमात्र आदर्श था- ‘‘राम काज कीन्हें बिना, मोहि कहॉं विश्राम।’’ इन्हीं शब्दों को स्मरण करते हुये बेहोंशी में जाऊॅगा और अगर तुम्हें इस अकिंचन सेवक से और कुछ काम लेना श्रेयस्कर दिखे तो वापस बुला लेना- वर्ना जीवन में जो कुछ तुम्हारी कृपा से कर सका हूॅ- मेरे लिये पर्याप्त है।

पुनश्च-

भगवन, आपकी प्रेरणा से संत तुलसीदास ने आपकी महिमा का वर्णन करके सभी प्राणियों के लिये एक प्रेरणास्त्रोत के रूप में रामचरित मानस दिया। इतनी कृपा और कर देते तो इस देश पर आपत्ति के बादल आज नहीं मंडराते, यदि संत तुलसी ने अयोध्या जी में आपके जन्मस्थान पर निर्मित मंदिर का भी वर्णन कर दिया होता। वो तो केवल इतना ही कहकर रूक गये- ‘‘भये प्रकट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी’’-

कुछ अनुत्तरित प्रश्न आने वाली पीढ़ियों के विवेक पर हरदम छूट जाते हैं। हम सबको कम से कम इतनी सद्बुद्धि तो जरूर दीजिये कि इनका उत्तर आपके सच्चे भक्तों की भॉति खोजने का प्रयास तो करें।