विंध्य क्षेत्र, विशेष रूप से रीवा और उसके आसपास का भू-भाग भारतीय राजनीति के इतिहास में एक विशिष्ट और गरिमामय स्थान रखता है। यह क्षेत्र केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वैचारिक रूप से भी अत्यंत समृद्ध रहा है। वैदिक ग्रंथों में विंध्याचल का उल्लेख मिलता है। मध्यकाल में कलचुरी शासकों के पश्चात बघेल राजपूतों ने रीवा को अपनी राजधानी बनाकर एक सशक्त राज्य की स्थापना की। इन शासकों ने कला, साहित्य और संगीत को संरक्षण देकर सत्ता को सांस्कृतिक गरिमा से जोड़ा।
इसी विंध्य अंचल ने आधुनिक भारत को ऐसे अनेक नेतृत्वकर्ता दिए, जिन्होंने न केवल क्षेत्र का मान बढ़ाया, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को वैचारिक मजबूती भी प्रदान की। इन्हीं विशिष्ट व्यक्तित्वों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण नाम है कुँवर अर्जुन सिंह। उनका जीवन और राजनीतिक यात्रा लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और जनसेवा की परंपरा का सशक्त उदाहरण है।
अर्जुन सिंह का जन्म 5 नवंबर 1930 को रीवा जिले की चुरहट जागीर में हुआ। उनका राजनीतिक जीवन वर्ष 1957 में मध्य प्रदेश विधानसभा से प्रारंभ हुआ, जब उन्होंने युवा अवस्था में निर्दलीय विधायक के रूप में प्रवेश किया। स्वतंत्र चिंतन, जमीनी पकड़ और आम जनता से गहरे जुड़ाव ने उन्हें शीघ्र ही अलग पहचान दिलाई। यह वह दौर था जब राजनीति करना कोई आसान काम नहीं था, उस समय की राजनीति केवल सत्ता-प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि समाज के प्रति गंभीर उत्तरदायित्व के रूप में हुआ करती थी।
अर्जुन सिंह जी वर्ष 1960 में कांग्रेस की लोकतांत्रिक विचारधारा से प्रभावित होकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए। चुरहट उनका राजनीतिक गढ़ बना और जीवनपर्यंत बना रहा। वे अनेक बार वहाँ से निर्वाचित हुए। उन्होंने राजनीति को गाँव की चौपाल, खेतों और आम जन की समस्याओं से समझा। किसान, आदिवासी, दलित और वंचित वर्गों की पीड़ा हमेशा उनकी राजनीति के केंद्र में रही। वे सत्ता में रहते हुए भी जनता से निरंतर संवाद बनाए रखते थे। शायद यही कारण था कि जनता ने उन्हें बार-बार अपना प्रतिनिधि चुना और उन पर अटूट विश्वास किया।
उनका व्यक्तित्व गंभीर, सधा हुआ और गरिमामय था। वे कम बोलते थे, किंतु जब बोलते थे तो उनके शब्दों में अनुभव और विचार की गहराई स्पष्ट झलकती थी। विंध्य क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता निरंतर जनसंपर्क और ठोस विकास कार्यों पर आधारित रही। सड़क निर्माण, बिजली, पानी, शिक्षा और प्रशासनिक सुधार उनके विकास दृष्टिकोण के प्रमुख आधार थे। उनके प्रयासों से रीवा संभाग एक सशक्त राजनीतिक केंद्र के रूप में उभरा और लंबे समय तक कांग्रेस की मजबूत पकड़ बनी रही। विंध्य क्षेत्र में ओबीसी राजनीति की संगठित शुरुआत का श्रेय भी काफी हद तक अर्जुन सिंह को ही जाता है।
मुख्यमंत्री के रूप में अर्जुन सिंह ने दो बार मध्य प्रदेश की बागडोर संभाली-पहली बार 1980 से 1985 तक और दूसरी बार 1988 से 1989 तक। उनके कार्यकाल में विंध्य क्षेत्र, जो दशकों से उपेक्षा का शिकार रहा था, विकास की मुख्यधारा में आया। रीवा, सतना, शहडोल और सीधी जैसे जिलों में उनके द्वारा की गयी स्कूलों और महाविद्यालयों की स्थापना से नई पीढ़ी को आगे बढ़ने के अवसर मिले। उनका विकास-दृष्टिकोण केवल भौतिक संरचनाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक जागरूकता, समान अवसर और न्यायपूर्ण व्यवस्था को भी समाहित करता था।
मुझे स्मरण है कि मेरा उनसे पहला पहला साक्षात्कार वर्ष 1971 में हुआ, जब मैं शायद 15 वर्ष का था| उस वक्त मेरे पिताजी जबलपुर उच्च न्यायालय में न्यायाधीश हुआ करते थे और वे नव-निर्मित सीधी जिला न्यायालय के भवन का उद्घाटन करने गए थे और साथ में मुझे भी ले गए थे| उस कार्यक्रम में अर्जुन सिंह जी मध्य प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में विशिष्ट अतिथि बनकर आए थे। कार्यक्रम के बाद वे हमें अपने चुरहट स्थित निवास पर ले गए। वहीं पहली बार मैंने उनकी राजनीतिक विरासत की व्यापकता को निकट से महसूस किया।
वर्ष 1978 में मेरे पिताजी के असमय देहावसान के पश्चात मैं जीवन की कठिनाइयों में व्यस्त हो गया|मैंने 1979 में अपनी वकालत की पढाई पूर्ण करने के बाद जबलपुर में अपनी वकालत शुरू की| मैं अक्सर अख़बारों में अर्जुन सिंह जी के बारे में पढ़ा करता था| उस समय सोशल मीडिया के नाम पर केवल अखबार और दूरदर्शन ही हुआ करते थे| अख़बारों में पढ़कर मैंने उनके बारे में अपनी समझ विकसित की और मैं जहाँ तक उनको समझ पाया उनकी एक विशिष्ट विशेषता थी, प्रतिभा के प्रति गहरा सम्मान। वे हर उस व्यक्ति को महत्व देते थे जो अपने क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करता हो, चाहे वह वकील हो, डॉक्टर हो, लेखक हो, कलाकार हो या अभिनेता। मेधावी और कर्मठ लोग उन्हें विशेष रूप से प्रिय थे।
डॉ. भीमराव आंबेडकर के आदर्शों से प्रेरित अर्जुन सिंह का यह दृढ़ विश्वास था कि लोकतंत्र तभी सशक्त होता है, जब समाज का अंतिम व्यक्ति भी स्वयं को सत्ता की प्रक्रिया का सहभागी महसूस करे। दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्गों को राजनीति और प्रशासन में प्रतिनिधित्व देने के उनके प्रयास इसी सोच का परिणाम थे।
केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री रहते हुए राष्ट्रीय स्तर पर 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण लागू करवाने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही। विशेष रूप से आईआईटी और आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में आरक्षण लागू करना सामाजिक न्याय की दिशा में एक साहसिक और दूरदर्शी कदम था। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को उनके निर्णयों पर भरोसा था|यह उन पर भरोसे का ही परिणाम था कि जब वर्ष 1985 में पंजाब में हालात अत्यंत जटिल थे, तब उन्हें पंजाब का राज्यपाल बनाकर वहाँ की परिस्थितियों को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया|
वर्ष 1982 का एक स्मरणीय प्रसंग आज भी मेरे मन में अंकित है। जब मैं जबलपुर से साईखेड़ा (होशंगाबाद) एक सेशंस ट्रायल के लिए ट्रेन से यात्रा कर रहा था, संयोगवश उसी ट्रेन में अर्जुन सिंह जी अपनी धर्मपत्नी श्रीमती सरोज सिंह के साथ भोपाल जा रहे थे। उन्हें जब यह ज्ञात हुआ कि मैं भी उसी ट्रेन में हूँ, तो उन्होंने मुझे अपने डिब्बे में बुलाया और लगभग एक घंटे तक आत्मीय बातचीत की। एक युवा वकील के रूप में मेरे प्रयासों को उन्होंने खुले मन से सराहा। स्वयं विधि के क्षेत्र से जुड़े होने के कारण वे भली-भाँति जानते थे कि वकालत के प्रारंभिक वर्षों में कितनी चुनौतियों और संघर्षों का सामना करना पड़ता है। उनकी अद्भुत स्मरण शक्ति इस संवाद के दौरान स्पष्ट रूप से दिखाई दी| यह गुण उन्हें निकट से जानने वाले सभी लोग स्वीकार करते हैं।
इसके बात मेरी उनसे कई बार मुलाकात हुई| वर्ष 1988 में जब वो दूसरी बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो जब एक बार मेरे पिताजी की स्मृति में जबलपुर में मेमोरियल लेक्चर आयोजित होने वाला था, और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायमूर्ति जस्टिस एम्. वेंकटचलैया इस कार्यक्रम में अपना व्याख्यान देने वाले थे| उस वक्त जस्टिस जी. एल. ओझा (जो सुप्रीम कोर्ट के तात्कालिक न्यायमूर्ति थे) और मध्य प्रदेश के तात्कालिक न्यायमूर्ति जस्टिस गुलाब गुप्ता ने सुझाव दिया कि अर्जुन सिंह जी को भी इस मेमोरियल लेक्चर में आमंत्रित किया जाए| अतः उन्हें आमंत्रित करने मैं बाबू चंद्रमोहन जी के साथ उनसे मिलने भोपाल चला गया| वहाँ जाकर पता चला कि वह किसी आवश्यक कार्य से दिल्ली जा रहे हैं, अतः हमने भोपाल एयरपोर्ट ही उनसे मिलना उचित समझा और हम सीधे भोपाल एयरपोर्ट चले गए| भोपाल एयरपोर्ट पर अंततः मैं उनसे मिला और मैंने अनुरोध किया कि मेरे पिताजी की स्मृति में जबलपुर में कार्यक्रम हो रहा है और हम सभी चाहते है कि आप आएं| उस समय यद्यपि वह अत्यंत व्यस्त थे फिर भी उन्होंने मेरे कार्यक्रम हेतु अपनी स्वीकृति दे दी और वह मेरे कार्यक्रम में शामिल हुए|
इसके बाद वे दिल्ली आ गए और मैं भी अपनी वकालत में व्यस्त हो गया| इस दौरान मैं कई बार दिल्ली और भोपाल और विभिन्न कार्यक्रमों में उनसे मिला करता था और उनका स्नेह और सहयोग मुझे सदैव मिलता रहा|
4 मार्च 2011 को अर्जुन सिंह जी का दुःखद निधन हुआ। आज भी समूचा विंध्य प्रदेश उनके न रहने से उत्पन्न रिक्तता को महसूस करता है। उनका व्यक्तित्व और उनकी राजनीतिक विरासत आज भी विंध्य की राजनीति और भारतीय लोकतंत्र में जीवंत है।
अर्जुन सिंह संभवतः भारतीय राजनीति के उन विरल व्यक्तित्वों में से थे, जिन्होंने सत्ता को कभी निजी संपत्ति या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का साधन नहीं माना। उनके लिए सत्ता सदैव संविधान, लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक दायित्वों के प्रति एक गंभीर उत्तरदायित्व रही। आज भी देश का संविधान भवन उनके जैसे गंभीर, संवेदनशील और सामाजिक न्याय के प्रति अटूट प्रतिबद्ध नेतृत्व की कमी को मौन रूप से महसूस करता है।