साक्षात्कारकर्ता: नमस्कार। हम बात करने जा रहे हैं कीर्तिशेष भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्री अर्जुन सिंह जी के बारे में। अर्जुन सिंह जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी रहे और हम उनके बारे में चर्चा करने जा रहे हैं ऐसे व्यक्तित्व से, जो किसी परिचय का मोहताज नहीं है। जी हाँ, आप समझ गए होंगे। हम बात कर रहे हैं सप्रे संग्रहालय के संस्थापक श्री विजय दत्त श्रीधर जी से।

तो विजय श्रीधर जी, आपका स्वागत है।

विजय दत्त श्रीधर: जी, नमस्कार।

साक्षात्कारकर्ता: जी, सबसे पहले हम जानना चाहेंगे कि आपकी अर्जुन सिंह जी से पहली निकटता कैसे और कब हुई?

विजय दत्त श्रीधर: 1980 में, बल्कि उससे थोड़ा पहले, तब अर्जुन सिंह जी विपक्ष के नेता थे। उस समय हम लोग मध्य प्रदेश आंचलिक पत्रकार संघ चलाते थे। उसी के बैनर तले पत्रकारों और प्रशासन के बीच एक बड़ा ऐतिहासिक संघर्ष हुआ। यह घटना छतरपुर की है और पत्रकारिता के इतिहास में इसे एक मील के पत्थर के रूप में याद किया जाता है।

छतरपुर में एक पुलिस अधिकारी ने परीक्षा देने आई एक बच्ची के साथ बलात्कार किया था। पुलिस ने मामले को दबाने की कोशिश की। जनता में भारी आक्रोश था। लोग सड़कों पर उतर आए और पत्रकारों ने पीड़ित बच्ची का साथ दिया। वे न्याय के पक्ष में खड़े हो गए।

इससे कलेक्टर और पूरा प्रशासन बेहद नाराज़ हो गया। एक जाँच रिपोर्ट तैयार हुई। एस.डी.एम. ने जाँच करवाई, लेकिन रिपोर्ट आने के बाद कलेक्टर साहब उसे दबाकर बैठ गए। पत्रकारों ने किसी तरह वह रिपोर्ट प्राप्त की और उसका प्रकाशन 'शुभ भारत', 'क्रांति' तथा अन्य स्थानीय समाचार पत्रों में किया।

बस, फिर क्या था। कलेक्टर साहब सातवें आसमान पर पहुँच गए। पत्रकारों को अपराधी की तरह देखा जाने लगा।

जब यह सब हुआ तो हमारे एक वरिष्ठ सहयोगी भूषण देव सागर जी थे। वे कांग्रेस के बड़े नेता थे और पेशे से वकील भी थे। हमने उनसे पूछा—

"भाई, वहाँ बच्चों का कलेक्टर से संघर्ष हो गया है। अब क्या करना चाहिए?"

उन्होंने साफ कहा—

"भोपाल में बैठकर मुख्यमंत्री से लड़ा जा सकता है। दिल्ली में बैठकर प्रधानमंत्री से भी लड़ा जा सकता है। लेकिन किसी ज़िले में कलेक्टर से लड़ना बहुत कठिन होता है। पटवारी और थानेदार से भी लड़ना आसान नहीं होता। यदि ये बच्चे संघर्ष कर रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि वे सच के लिए खड़े हैं।"

इसके बाद हमारी मुलाकात अर्जुन सिंह जी से हुई। तब वे मुख्यमंत्री बन चुके थे।

विजय दत्त श्रीधर: तब विधानसभा में कपूर भोवरा जी, जो उस समय कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक थे (बाद में वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए), तथा बट जी ने विधानसभा में इस पूरे मामले को बहुत तल्ख़ी और गंभीरता के साथ उठाया। अंततः मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह जी ने घोषणा कर दी कि इस मामले की न्यायिक जाँच कराई जाएगी।

हिन्दुस्तान के इतिहास में किसी ज़िला मजिस्ट्रेट (कलेक्टर) के विरुद्ध पत्रकारिता की स्वतंत्रता के प्रश्न पर यह पहली न्यायिक जाँच थी। उस समय के ज़िला न्यायाधीश ने जाँच की।

जाँच के दौरान प्रशासन की ओर से यह आरोप लगाया गया कि पत्रकार ब्लैकमेलर हैं, लेकिन एक भी आरोप सिद्ध नहीं हो सका। इससे यह स्पष्ट हो गया कि पत्रकार अपने दायित्व का निर्वहन कर रहे थे।

असल समस्या यह थी कि कलेक्टर को कानून की पूरी जानकारी नहीं थी। उन्हें यह भी समझ नहीं थी कि किसी ज़िले में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और संबंधित पक्षों के साथ व्यवहार करते समय एक कलेक्टर का दृष्टिकोण और आचरण कैसा होना चाहिए।

अंततः उनके सी.आर. (Confidential Report) में भी इस मामले का उल्लेख दर्ज हुआ।

बाद में जब अर्जुन सिंह जी से इस विषय पर चर्चा हुई तो उन्होंने मुझसे कहा—

"पंडित जी, आप मुझे सीधे बता देते, तो जैसा आप चाहते थे वैसा कर देता।"

मैंने उनसे कहा—

"डॉक्टर साहब, आप तो वह कर ही रहे थे, लेकिन उससे कोई नज़ीर नहीं बनती। आज पूरे हिन्दुस्तान में यह एक मिसाल बन गई कि प्रेस के साथ प्रशासन का व्यवहार कैसा होना चाहिए।"

आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हम उन्हें इस बात के लिए विशेष रूप से याद करते हैं कि उन्होंने तत्कालीन मुख्य सचिव के हस्ताक्षर से एक परिपत्र (Circular) जारी करवाया।

उसमें स्पष्ट निर्देश दिए गए कि यदि कहीं पत्रकारों से जुड़ा कोई विवाद सामने आए, तो पहले जनसंपर्क विभाग के माध्यम से पूरे मामले के तथ्य, परिस्थितियाँ और प्रमाण एकत्र किए जाएँ। उसके बाद ही कोई प्रशासनिक कार्रवाई की जाए।

इस निर्णय का बहुत दूरगामी प्रभाव पड़ा। पूरे देश में प्रशासन और पत्रकारों के संबंधों को लेकर एक सकारात्मक उदाहरण स्थापित हुआ।

इसी कारण हमारे मन में अर्जुन सिंह जी के प्रति हमेशा एक विशेष सम्मान और आत्मीयता बनी रही।

साक्षात्कारकर्ता: जी, तो इस घटना के बाद आपकी उनसे निकटता बढ़ी। हम जानना चाहेंगे कि राजनीति से परे, एक व्यक्ति के रूप में श्री अर्जुन सिंह जी के बारे में आपकी पहली छवि क्या रही?

विजय दत्त श्रीधर: अर्जुन सिंह जी से उस घटना के बाद हमारा संवाद लगातार बढ़ता गया। सबसे पहले हमने 'आंचलिक पत्रकार' नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया। उससे पहले गाँवों में कार्य करने वाले संवाददाताओं के लिए एक छोटी-सी गाइड बुक भी तैयार की थी, क्योंकि उस समय पत्रकारिता का कोई व्यवस्थित प्रशिक्षण उपलब्ध नहीं था।

उस गाइड बुक का विमोचन कराने के लिए हमने अर्जुन सिंह जी को आमंत्रित किया। उन्होंने उसका विमोचन किया। उसके बाद हमारा संवाद और अधिक गहरा होता गया।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे बोलते कम थे और सुनते अधिक थे। और जब बोलते थे, तो बहुत संक्षेप में, सूत्र रूप में अपनी बात रखते थे।

सन् 1983 में मुझे मध्य प्रदेश ग्रंथ अकादमी की ओर से 'मध्य प्रदेश में पत्रकारिता का इतिहास' पुस्तक तैयार करने का कार्य मिला। तीन-चार साथियों के सहयोग से वह कार्य पूरा हुआ। उस पुस्तक का विमोचन भी अर्जुन सिंह जी ने ही किया।

उस पुस्तक के संपादन के सिलसिले में हमें पूरे प्रदेश का भ्रमण करना पड़ा। तब हमें यह अनुभव हुआ कि पत्रकारिता और इतिहास से संबंधित अधिकांश सामग्री न तो किसी पुस्तकालय में उपलब्ध थी और न ही किसी सरकारी अभिलेखागार में। विश्वविद्यालयों में भी उसका समुचित संग्रह नहीं था।

यह सामग्री ऐसे लोगों के निजी संग्रहों में सुरक्षित थी, जिन्हें हम विद्यानुरागी या विद्याव्यसनी कह सकते हैं। ऐसे लोग, जो बिना पढ़े रह नहीं सकते थे और जीवन भर दुर्लभ सामग्री एकत्रित कर उसे सुरक्षित रखते रहे।

उनके संग्रहों में हमें अत्यंत महत्वपूर्ण सामग्री मिली, लेकिन साथ ही यह चिंता भी हुई कि यदि समय रहते उसे सुरक्षित नहीं किया गया, तो वह हमेशा के लिए नष्ट हो जाएगी। पुराने समाचार-पत्रों के पन्ने इतने जर्जर हो चुके थे कि उन्हें हाथ लगाते ही वे टूटने लगते थे।

हमें लगा कि यदि यह सामग्री नष्ट हो गई, तो इतिहास के अनेक महत्वपूर्ण प्रमाण भी समाप्त हो जाएँगे। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन, समाज सुधार आंदोलनों, स्वदेशी आंदोलन, शिक्षा के प्रसार और अनेक ऐतिहासिक घटनाओं का वास्तविक दस्तावेज़ी इतिहास इन्हीं समाचार-पत्रों में सुरक्षित था।

जबलपुर में रामेश्वर गुरु जी जैसे विद्वानों के पास दो-दो कमरों में दुर्लभ सामग्री संग्रहित थी। लेकिन यह भी चिंता थी कि आने वाली पीढ़ियाँ शायद उस सामग्री को उसी प्रकार सुरक्षित न रख सकें।

तब विचार आया कि इस समस्त सामग्री को एक ही छत के नीचे सुरक्षित रखा जाए। उसकी पहली शर्त सुरक्षा हो और दूसरी शर्त यह कि शोधार्थियों को वहीं बैठकर अध्ययन करने की सुविधा मिले, ताकि सामग्री सुरक्षित भी रहे और शोध के लिए उपलब्ध भी हो।

इसी विचार के साथ हम भोपाल लौटे। हमारे मित्र बी.आर. यादव जी, जो पहले नवभारत, बिलासपुर के मुख्य संवाददाता रहे थे, उनके माध्यम से हमारी मुलाकात पुनः अर्जुन सिंह जी से हुई।

हमने विस्तार से पूरी योजना उनके सामने रखी। वे लगभग पंद्रह मिनट तक अत्यंत ध्यान से हमारी बातें सुनते रहे। बीच-बीच में केवल इतना कहते—

"अच्छा..."

उनकी यही शैली थी। वे पहले पूरी बात सुनते थे, फिर निर्णय लेते थे।

जब हम बाहर निकले तो मैंने यादव जी से कहा—

"उन्होंने विचार तो ध्यान से सुना, लेकिन कुछ कहा नहीं। अब आगे क्या होगा?"

शाम लगभग पाँच बजे से पहले ही सूचना विभाग के संचालक का फोन आया। उन्होंने कहा—

"श्रीधर जी, आपकी योजना मुख्यमंत्री जी को बहुत पसंद आई है। उन्होंने कहा है कि इस पर तुरंत आगे बढ़िए।"

तब हमें विश्वास हुआ कि वे केवल सुन नहीं रहे थे, बल्कि मन ही मन निर्णय भी ले चुके थे।

आगे चलकर इसी विचार ने सप्रे संग्रहालय की स्थापना का रूप लिया।

19 जून 1984 को भोपाल के पुराने कमला पार्क परिसर में स्थित एक छोटे-से भवन से सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान की स्थापना हुई। प्रारंभ में वही छोटा-सा स्थान इस कार्य के लिए उपलब्ध कराया गया था, जिसे व्यवस्थित कर संग्रहालय का कार्य आरंभ किया गया।

बाद में एक अवसर पर अर्जुन सिंह जी ने मुझसे पूछा—

"सप्रे जी के बारे में विस्तार से बताइए।"

मैंने कहा—

माधवराव सप्रे वे व्यक्तित्व थे जिन्होंने हिन्दी में अर्थशास्त्र की शब्दावली तैयार की। उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को संस्कार प्रदान किए। हिन्दी की पहली मौलिक कहानी "एक टोकरी भर मिट्टी" लिखने का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है।

जब नागरी प्रचारिणी सभा, काशी ने हिन्दी विश्वकोश तैयार करने की योजना बनाई, तब उसके एक महत्वपूर्ण खंड की जिम्मेदारी माधवराव सप्रे को सौंपी गई। उस समय वे केवल स्नातक थे।

सरकारी नौकरी के रूप में उन्हें एक्स्ट्रा असिस्टेंट कमिश्नर (डिप्टी कलेक्टर) बनने का अवसर भी मिला, लेकिन उन्होंने सरकारी सेवा स्वीकार नहीं की। उन्होंने पत्रकारिता को अपना जीवन-कार्य बनाया और पेंड्रा रोड से "छत्तीसगढ़ मित्र" नामक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया।

उनका एक और बड़ा गुण था—वे प्रतिभाशाली युवाओं को पहचान लेते थे और उनका मार्गदर्शन करते थे।

ऐसे ही एक युवा थे पंडित माखनलाल चतुर्वेदी

उस समय वे एक सरकारी विद्यालय में अध्यापक थे। स्वदेशी आंदोलन पर लिखे उनके एक निबंध को प्रथम पुरस्कार मिला। वह निबंध जब माधवराव सप्रे की दृष्टि में आया तो उन्होंने तुरंत उनकी प्रतिभा को पहचान लिया।

उन्होंने माखनलाल जी को पत्र लिखकर कहा—

"तुम्हारा जन्म सरकारी नौकरी करने के लिए नहीं हुआ है। तुम्हारा जन्म राष्ट्रीय कार्य के लिए हुआ है।"

इसी प्रेरणा के बाद माखनलाल चतुर्वेदी ने अध्यापक पद से त्यागपत्र दिया।

सन् 1913 में वे 'प्रभा' पत्रिका के संपादक बने। बाद में 17 जनवरी 1920 को जब 'कर्मवीर' का प्रकाशन प्रारंभ हुआ, तब उसके संपादक भी बने।

आगे चलकर वे हिन्दी साहित्य, राष्ट्रीय पत्रकारिता और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख सेनानियों में गिने गए। वे मध्य प्रांत में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के प्रथम सत्याग्रही भी रहे।

अर्जुन सिंह जी अत्यंत ध्यानपूर्वक मेरी पूरी बात सुनते रहे।

जब मैंने यह सब बताया तो उन्होंने कहा—

"अच्छा... तो सप्रे जी इतने बड़े व्यक्तित्व थे। आपने उनका बहुत यथोचित परिचय कराया।"

उनकी यही विशेषता थी। वे किसी विषय को केवल औपचारिक रूप से नहीं सुनते थे, बल्कि उसकी आत्मा तक पहुँचने का प्रयास करते थे।

हमारे और उनके संबंध केवल मुख्यमंत्री और पत्रकार के नहीं थे। उन संबंधों की बुनियाद विचार, अध्ययन और सांस्कृतिक सरोकारों पर टिकी हुई थी।

साक्षात्कारकर्ता: जी, जानना चाहेंगे कि महत्वपूर्ण निर्णयों के समय श्री अर्जुन सिंह अपने सहयोगियों और सलाहकारों पर कितना भरोसा करते थे?

विजय दत्त श्रीधर: वे अपने सहयोगियों पर पूरा विश्वास करते थे, इसलिए उनसे सलाह भी लेते थे।

अर्जुन सिंह जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय से पहले अपने सभी सहयोगियों की राय ध्यान से सुनते थे। आज जिसे कोर टीम कहा जाता है, उस प्रकार की बैठकों में वे स्वयं पहले अपना मत व्यक्त नहीं करते थे।

वे सभी लोगों की राय बड़े सम्मान के साथ सुनते थे और उसके बाद अपने विवेक से निर्णय लेते थे। उनका निर्णय ऐसा होता था, जिसमें सभी के विचारों का कहीं न कहीं समावेश दिखाई देता था।

उदाहरण के लिए झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों को पट्टे देकर उन्हें मालिकाना हक़ दिलाने का निर्णय हो या रिक्शा चालकों को उनके रिक्शों का स्वामित्व दिलाने का निर्णय—ये सब उनके सामाजिक दृष्टिकोण के उदाहरण थे।

उस समय अधिकांश रिक्शा चालक किराये पर रिक्शा चलाते थे। वे दिन-भर मेहनत करते थे, लेकिन रिक्शा उनका अपना नहीं होता था। अर्जुन सिंह जी ने ऐसी व्यवस्था बनाई कि उन्हें स्वयं अपने रिक्शे का मालिक बनने का अवसर मिले।

इसी प्रकार तेंदूपत्ता के राष्ट्रीयकरण का निर्णय भी अत्यंत महत्वपूर्ण था।

तेंदूपत्ता जंगलों में स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होता है। आदिवासी और वनवासी उसे एकत्र करते थे, लेकिन उसका सबसे अधिक लाभ व्यापारियों को मिलता था। मजदूरों को बहुत कम पारिश्रमिक प्राप्त होता था।

अर्जुन सिंह जी ने तेंदूपत्ता का राष्ट्रीयकरण किया। इसके बाद तेंदूपत्ता संग्राहकों को बेहतर मजदूरी मिलने लगी। उन्हें बोनस भी मिलने लगा। इससे आदिवासी और वनवासी परिवारों की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ।

उनकी दृष्टि हमेशा समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने की थी।

चाहे पट्टों का वितरण हो, रिक्शा चालकों को स्वामित्व दिलाना हो या तेंदूपत्ता संग्राहकों के अधिकारों की रक्षा—इन सभी निर्णयों के पीछे उनका उद्देश्य केवल एक था—

समाज के उस अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुँचना, जो सबसे अधिक वंचित है।

महात्मा गांधी भी यही कहते थे कि जब समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के जीवन में खुशहाली आएगी, तभी वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ पूरा होगा।

मुझे लगता है कि अर्जुन सिंह जी उसी विचारधारा पर चलने वाले राजनेता थे।

साक्षात्कारकर्ता: तो आपसे हुई चर्चा से जुड़ा मेरा एक और प्रश्न है। औद्योगिक विकास और आदिवासी अधिकारों के बीच उन्होंने संतुलन किस प्रकार स्थापित किया?

विजय दत्त श्रीधर: देखिए, औद्योगिक विकास प्रायः शहरों या शहरों के आसपास ही केंद्रित रहता है। हमारे यहाँ मंडीदीप, पीथमपुर, मालनपुर, पीलेखेड़ी जैसे औद्योगिक क्षेत्र विकसित हुए। उद्योगों के लिए सड़क, परिवहन, बिजली, शिक्षा, चिकित्सा और अन्य मूलभूत सुविधाएँ आवश्यक होती हैं, इसलिए वे सामान्यतः शहरों के निकट ही स्थापित होते हैं।

लेकिन अर्जुन सिंह जी का विशेष आग्रह यह रहता था कि जहाँ भी उद्योग स्थापित हों, वहाँ की स्थानीय आबादी को अधिक से अधिक रोजगार मिले।

वे जानते थे कि इंजीनियर, वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ बाहर से आएँगे, क्योंकि उनके लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। लेकिन जो सामान्य श्रमिक हैं, जो मेहनत-मजदूरी करके अपना जीवन चलाते हैं, उन्हें प्राथमिकता स्थानीय लोगों को मिलनी चाहिए।

यदि आप पीथमपुर जैसे औद्योगिक क्षेत्र को देखें, तो वहाँ आसपास के धार तथा अन्य क्षेत्रों के हजारों लोगों को रोजगार मिला। इसका लाभ सीधे उन परिवारों तक पहुँचा जो वर्षों से मेहनत-मजदूरी पर निर्भर थे।

उनकी सोच केवल उद्योग स्थापित करने तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह भी थी कि उससे स्थानीय समाज का आर्थिक विकास हो।

साक्षात्कारकर्ता: जानना चाहेंगे कि मध्य प्रदेश के औद्योगिक और कृषि विकास को लेकर उनकी दीर्घकालिक सोच क्या थी?

विजय दत्त श्रीधर: अर्जुन सिंह जी एक समय कृषि मंत्री भी रहे थे। कृषि के विषय में उनकी जानकारी बहुत गहरी थी।

उस समय गेहूँ और धान की पारंपरिक किस्में अधिक ऊँची होती थीं। तेज हवा या वर्षा होने पर फसल गिर जाती थी, जिससे उत्पादन पर बहुत प्रभाव पड़ता था।

उन्होंने कम ऊँचाई वाली उन्नत किस्मों को बढ़ावा दिया। इससे दो लाभ हुए—पहला, फसल गिरने का खतरा कम हुआ और दूसरा, प्रति हेक्टेयर उत्पादन में वृद्धि हुई।

वे कृषि क्षेत्र में हो रहे वैज्ञानिक अनुसंधानों और नई तकनीकों की जानकारी स्वयं रखते थे। ऐसा नहीं था कि केवल अधिकारी उन्हें जानकारी देते हों। कई बार वे स्वयं अधिकारियों को नई किस्मों, नई तकनीकों और कृषि सुधारों के बारे में बताते थे।

उन्हें खेती-किसानी के विषय में गहरी रुचि थी और वे निरंतर अध्ययन करते रहते थे।

साक्षात्कारकर्ता: ओबीसी आरक्षण लागू करते समय काफी विरोध भी हुआ था। उस समय उन्होंने उस स्थिति को किस प्रकार संभाला?

विजय दत्त श्रीधर: लोग सामान्यतः विश्वनाथ प्रताप सिंह के समय की चर्चा करते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश में अर्जुन सिंह जी ने इससे पहले ही इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य प्रारंभ कर दिया था।

सन् 1984 में उन्होंने रामजी महाजन आयोग का गठन किया। आयोग ने पिछड़े वर्गों की पहचान की और उनके लिए शिक्षा तथा रोजगार के क्षेत्र में आवश्यक सुविधाओं और अवसरों की अनुशंसा की।

उस समय सबसे अधिक ध्यान शिक्षा पर दिया गया ताकि पिछड़े वर्गों के बच्चे पढ़-लिखकर आगे बढ़ सकें। बाद में रोजगार और अन्य क्षेत्रों में भी उन्हें अवसर मिलने लगे।

आज पंचायतों और नगरीय निकायों में जो ओबीसी आरक्षण दिखाई देता है, उसकी वैचारिक आधारशिला उसी समय रखी गई थी।

उनकी सोच स्पष्ट थी कि समाज के सभी वर्ग साथ-साथ आगे बढ़ें। विशेष रूप से वे उन वर्गों के लिए अधिक संवेदनशील थे जिन्हें लंबे समय तक अवसर नहीं मिले थे।

इसी कारण मैं मानता हूँ कि इस विषय में भी अर्जुन सिंह जी अपने समय से आगे सोचने वाले नेता थे।

साक्षात्कारकर्ता: सर, फूलन देवी के आत्मसमर्पण को भारतीय इतिहास की एक ऐतिहासिक घटना माना जाता है। उस समय पुलिस का दबाव भी था और मानवीय दृष्टिकोण भी। ऐसे में अर्जुन सिंह जी ने इस विषय को किस प्रकार देखा?

विजय दत्त श्रीधर: इस विषय को समझने के लिए हमें हृदय परिवर्तन की भारतीय परंपरा को समझना होगा।

हमारे प्राचीन आख्यानों में अंगुलिमाल का प्रसंग मिलता है। वह एक भयानक डाकू था, लेकिन भगवान बुद्ध के सान्निध्य में उसका हृदय परिवर्तन हुआ। इसी प्रकार महर्षि वाल्मीकि का जीवन भी इसका उदाहरण है।

बाद में आचार्य विनोबा भावे ने भी चंबल क्षेत्र के डाकुओं के आत्मसमर्पण का प्रयास किया। सन् 1960 में उन्होंने इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल की। उस समय राजा मानसिंह के पुत्र तहसीलदार सिंह सहित अनेक लोगों से उनका संवाद हुआ।

विनोबा जी का उद्देश्य केवल डाकुओं से हथियार डलवाना नहीं था, बल्कि उन्हें समाज की मुख्यधारा में वापस लाना था।

बाद में यह प्रयास कुछ कारणों से आगे नहीं बढ़ सका।

फिर सन् 1972 में चंबल क्षेत्र के कई बड़े डाकू सरदारों ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के माध्यम से आत्मसमर्पण की इच्छा व्यक्त की।

वे पहले विनोबा भावे के पास गए। उस समय विनोबा जी ने क्षेत्र-संन्यास ले लिया था। उन्होंने कहा—

"अब आप जयप्रकाश जी के पास जाइए।"

इसके बाद वे पटना गए। वहाँ पता चला कि जयप्रकाश जी दिल्ली में हैं। फिर वे दिल्ली पहुँचे।

शुरू में उन्होंने अपनी वास्तविक पहचान नहीं बताई। कई दिनों तक सामान्य बातचीत होती रही।

एक दिन वे जयप्रकाश जी के चरणों में गिर पड़े और बोले—

"मैं डाकू हूँ। समाज की मुख्यधारा में वापस आना चाहता हूँ।"

जयप्रकाश जी ने उनसे कहा—

"मैं समझ गया था कि तुम कोई साधारण व्यक्ति नहीं हो। तुम्हारी बातचीत ही बता रही थी।"

इसके बाद जयप्रकाश जी ने भारत सरकार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान सरकारों से विस्तृत चर्चा की।

उन्होंने एक स्पष्ट शर्त रखी—

जो लोग आत्मसमर्पण करेंगे, उनके मुकदमे कानून के अनुसार चलेंगे, उन्हें अपने अपराध स्वीकार करने होंगे, सज़ा भी मिलेगी, लेकिन किसी को भी मृत्युदंड नहीं दिया जाएगा।

साथ ही यह भी तय हुआ कि जिन अपराधों में वे वास्तव में शामिल नहीं थे, उनमें उन्हें झूठा नहीं फँसाया जाएगा।

इसी विश्वास के आधार पर 14 अप्रैल 1972 से 15 मई 1972 के बीच जौरा (मुरैना) स्थित गांधी आश्रम में जयप्रकाश नारायण की उपस्थिति में लगभग 270 डाकुओं ने महात्मा गांधी के चित्र के सामने अपने हथियार डाल दिए।

यह विश्व इतिहास की अपनी तरह की एक अद्वितीय घटना थी।

अर्जुन सिंह जी इन सभी ऐतिहासिक घटनाओं का गहराई से अध्ययन करते थे। वे मानते थे कि यदि अवसर मिले तो हर व्यक्ति समाज की मुख्यधारा में लौट सकता है।

इसी सोच के कारण बाद के वर्षों में उन्होंने फूलन देवी सहित अनेक आत्मसमर्पण करने वाले लोगों के प्रति भी मानवीय दृष्टिकोण अपनाया और उनके पुनर्वास का समर्थन किया।

विजय दत्त श्रीधर: अर्जुन सिंह जी बहुत अध्ययनशील व्यक्ति थे। मेरी समझ से वे उन विरले राजनेताओं में थे, जिनकी सबसे बड़ी शक्ति उनका निरंतर अध्ययन था।

उनके निजी पुस्तक-संग्रह में लगभग 1300 पुस्तकें थीं। मैंने स्वयं उन पुस्तकों को देखा है। शायद ही कोई ऐसी पुस्तक होगी, जिसके पन्नों पर उनकी पेंसिल से की गई टिप्पणी, रेखांकन (Underline) या नोट न मिले हों।

इसका अर्थ था कि वे केवल पुस्तकें इकट्ठी नहीं करते थे, बल्कि उन्हें गंभीरता से पढ़ते भी थे।

उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी। इतिहास, साहित्य, राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था—लगभग हर विषय के संदर्भ उनके मन में सुरक्षित रहते थे। जब किसी विषय पर चर्चा होती, तो वे तुरंत उससे संबंधित ऐतिहासिक उदाहरण भी सामने रख देते थे।

इसी अध्ययनशीलता के कारण उनके निर्णयों में गहराई दिखाई देती थी।

बाद के वर्षों में चंबल क्षेत्र में डकैती की समस्या लगभग समाप्त हो गई। समाज की मुख्यधारा में लौटने की प्रक्रिया ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

साक्षात्कारकर्ता: अब हम भारत के इतिहास की एक अत्यंत दुखद घटना—भोपाल गैस त्रासदी—की चर्चा करना चाहेंगे। उस समय क्या कोई ऐसा क्षण आपको याद है जब अर्जुन सिंह जी ने औपचारिकताओं से ऊपर उठकर तत्काल राहत पहुँचाने का कार्य किया हो?

विजय दत्त श्रीधर: बिल्कुल।

जब भोपाल गैस त्रासदी हुई, तब सबसे पहले पत्रकार राजकुमार केसवानी का नाम याद आता है। उन्होंने दुर्घटना से पहले ही कई लेखों के माध्यम से चेतावनी दी थी कि यदि सुरक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया, तो बहुत बड़ी दुर्घटना हो सकती है।

दुर्भाग्य से उनकी चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया गया।

फिर वह भीषण रात आई और देखते ही देखते हजारों लोग प्रभावित हो गए।

उस समय सबसे बड़ी समस्या यह थी कि किसी को समझ ही नहीं आ रहा था कि तत्काल क्या किया जाए।

ऐसी स्थिति में अर्जुन सिंह जी ने सबसे पहले उन लोगों के बारे में सोचा, जो रोज़ कमाकर अपना जीवन चलाते थे। गैस त्रासदी के कारण उनका रोजगार अचानक छिन गया था।

उन्होंने तत्काल 15 करोड़ रुपये मूल्य के अनाज की व्यवस्था करवाई।

शहर के अनेक विद्यालयों में राहत शिविर बनाए गए। प्रभावित परिवारों के रहने, भोजन और आवश्यक सहायता की व्यवस्था की गई।

चिकित्सा व्यवस्था को भी तत्काल सक्रिय किया गया। अनेक वरिष्ठ चिकित्सकों की टीमों को राहत कार्य में लगाया गया, ताकि प्रभावित लोगों का उपचार शीघ्र हो सके।

जो लोग अपने परिवार, रोजगार और सामान्य जीवन से अचानक वंचित हो गए थे, उनके लिए सरकार ने तत्काल राहत उपलब्ध कराई।

मुकदमे, कानूनी कार्रवाई और अन्य प्रक्रियाएँ बाद की बात थीं।

उस समय सबसे महत्वपूर्ण कार्य था—पीड़ित लोगों को तत्काल राहत पहुँचाना, और यह कार्य अर्जुन सिंह जी ने पूरी संवेदनशीलता के साथ किया।

उनकी प्राथमिकता स्पष्ट थी—

"जिसके हाथ से आजीविका छिन गई है, उसके घर का चूल्हा बंद नहीं होना चाहिए।"

यही कारण था कि राहत कार्यों में उन्होंने किसी प्रकार की देरी नहीं होने दी।

साक्षात्कारकर्ता: भारत भवन ने भोपाल की एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बनाई। इसकी स्थापना में श्री अर्जुन सिंह जी की व्यक्तिगत भूमिका और दृष्टि क्या रही?

विजय दत्त श्रीधर: भारत भवन वास्तव में कलाओं का घर है। पहले भी इस प्रकार की कल्पना की गई थी कि देश के प्रत्येक राज्य की राजधानी में ऐसा एक सांस्कृतिक केंद्र होना चाहिए, जहाँ साहित्य, संगीत, रंगमंच, चित्रकला और अन्य कलाओं का समन्वित विकास हो सके। लेकिन इस दिशा में ठोस पहल नहीं हो पाई थी।

अर्जुन सिंह जी के मुख्यमंत्री रहते हुए इस योजना को साकार करने का कार्य प्रारंभ हुआ। इस पूरी परिकल्पना को मूर्त रूप देने में अशोक वाजपेयी जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही और उन्हें अर्जुन सिंह जी का पूरा सहयोग तथा विश्वास प्राप्त था।

वे उन्हें पूरी स्वतंत्रता देते थे। योजनाओं पर चर्चा होती थी, सुझाव दिए जाते थे और फिर उन्हें आगे बढ़ाने का पूरा अवसर मिलता था।

भारत भवन की स्थापना के बाद देश के लगभग सभी प्रमुख साहित्यकार, कलाकार, संगीतज्ञ, रंगकर्मी और चित्रकार वहाँ आमंत्रित किए जाने लगे। उसी काल में कालिदास सम्मान जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों की गरिमा भी नई ऊँचाइयों तक पहुँची।

अर्जुन सिंह जी स्वयं इन कार्यक्रमों में पूरे मन से उपस्थित रहते थे।

मुझे एक घटना आज भी याद है।

प्रख्यात साहित्यकार अज्ञेय जी पहली बार भारत भवन आए थे। कार्यक्रम में अर्जुन सिंह जी को अध्यक्षता करनी थी। उन्होंने मंच पर जाकर अज्ञेय जी का स्वागत किया, लेकिन उसके बाद मंच पर बैठने के बजाय सामने श्रोताओं के बीच जाकर बैठ गए।

जब उनसे कहा गया—

"आपको तो मंच पर बैठना चाहिए।"

तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

"नहीं, मैं अज्ञेय जी को सुनने आया हूँ। मैं सामने बैठकर उनका व्याख्यान सुनूँगा।"

यही उनका बड़प्पन था।

वे कलाकारों और साहित्यकारों का केवल औपचारिक सम्मान नहीं करते थे, बल्कि वास्तव में उनकी प्रतिभा का आदर करते थे।

उनके समय में बड़े साहित्यकारों और कलाकारों का स्वागत करने के लिए वरिष्ठ अधिकारी स्वयं हवाई अड्डे या रेलवे स्टेशन तक जाते थे। अतिथियों को सम्मानपूर्वक विदा भी किया जाता था।

राजनीति में रहते हुए भी उन्होंने शिष्टाचार, संस्कार और सांस्कृतिक सम्मान की एक परंपरा स्थापित की।

साक्षात्कारकर्ता: क्या संघर्ष कर रहे कलाकारों और साहित्यकारों की उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर भी सहायता की?

विजय दत्त श्रीधर: बिल्कुल।

ऐसी अनेक घटनाएँ हैं, जब उन्होंने बिना किसी प्रचार के आर्थिक और व्यक्तिगत सहायता उपलब्ध कराई।

लेकिन उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे किसी पर एहसान नहीं जताते थे। उन्होंने कभी यह प्रयास नहीं किया कि लोग सार्वजनिक रूप से उनकी प्रशंसा करें।

कई लोगों की सहायता उन्होंने इस प्रकार की कि उसके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी भी हुई।

उनके लिए सहायता करना कर्तव्य था, प्रदर्शन नहीं।

साक्षात्कारकर्ता: सर, यदि हम अर्जुन सिंह जी के व्यक्तिगत जीवन और कार्यशैली की बात करें, तो उनकी दिनचर्या कैसी थी? क्या वे अपने काम को लेकर बहुत अनुशासित थे?

विजय दत्त श्रीधर: निस्संदेह। अनुशासन उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक था।

वे समय के अत्यंत पाबंद थे। दिनभर की बैठकों, अधिकारियों से चर्चा, जनसंपर्क, राजनीतिक कार्यक्रमों और अध्ययन—इन सबके बीच वे अपने समय का बहुत व्यवस्थित ढंग से उपयोग करते थे।

उनकी एक विशेष आदत थी कि वे प्रत्येक विषय की पूरी तैयारी करके बैठते थे।

यदि किसी विभाग की समीक्षा बैठक होती, तो उससे पहले वे उससे संबंधित सभी फाइलें, आँकड़े और आवश्यक दस्तावेज़ पढ़ लेते थे। अधिकारी जब बैठक में आते थे, तब उन्हें यह अनुभव हो जाता था कि मुख्यमंत्री ने विषय का गहन अध्ययन पहले ही कर लिया है।

इस कारण बैठकों में केवल औपचारिक चर्चा नहीं होती थी, बल्कि विषय की गहराई तक बात पहुँचती थी।

वे अधिकारियों से कठिन प्रश्न भी पूछते थे, लेकिन उनका उद्देश्य किसी को असहज करना नहीं होता था। वे चाहते थे कि प्रशासन पूरी तैयारी और गंभीरता के साथ कार्य करे।

साक्षात्कारकर्ता: क्या वे लोगों से मिलने-जुलने में भी उतने ही सहज थे?

विजय दत्त श्रीधर: बिल्कुल।

उनके यहाँ मिलने आने वालों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता था।

एक ओर वरिष्ठ अधिकारी, न्यायविद, साहित्यकार और उद्योगपति उनसे मिलते थे, तो दूसरी ओर गाँव से आया कोई साधारण किसान, मजदूर या छात्र भी उतनी ही सहजता से अपनी बात रख सकता था।

वे सामने वाले की बात पूरी गंभीरता से सुनते थे।

कई बार ऐसा होता था कि कोई व्यक्ति बहुत भावुक होकर अपनी समस्या बताता था। अर्जुन सिंह जी बीच में उसे रोकते नहीं थे। पहले पूरी बात सुनते, फिर संबंधित अधिकारी को बुलाकर तत्काल आवश्यक निर्देश देते थे।

उनका मानना था कि शासन का उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान करना है, केवल फाइलों का निपटारा करना नहीं।

साक्षात्कारकर्ता: क्या वे अपने सहयोगियों को भी पढ़ने और निरंतर सीखने के लिए प्रेरित करते थे?

विजय दत्त श्रीधर: हाँ, और यह उनकी एक बहुत महत्वपूर्ण विशेषता थी।

वे स्वयं निरंतर पढ़ते थे, इसलिए चाहते थे कि उनके साथ काम करने वाले लोग भी अध्ययनशील हों।

किसी पुस्तक, लेख या रिपोर्ट में यदि उन्हें कोई महत्वपूर्ण बात मिलती, तो वे कई बार उसे अपने सहयोगियों को पढ़ने के लिए भी देते थे।

उनका विश्वास था कि केवल अनुभव पर्याप्त नहीं होता, निरंतर अध्ययन भी उतना ही आवश्यक है।

इसी कारण उनके साथ काम करने वाले अनेक अधिकारी और सहयोगी आज भी उन्हें एक अध्ययनशील, संवेदनशील और दूरदर्शी नेता के रूप में याद करते हैं।

साक्षात्कारकर्ता: अंत में मैं आपसे यह जानना चाहूँगा कि यदि आज की युवा पीढ़ी अर्जुन सिंह जी के जीवन से कोई सबसे बड़ी सीख लेना चाहे, तो वह क्या होगी?

विजय दत्त श्रीधर: मेरे विचार से सबसे पहली सीख है—निरंतर अध्ययन।

आज सार्वजनिक जीवन में बहुत से लोग सक्रिय हैं, लेकिन पढ़ने की आदत धीरे-धीरे कम होती जा रही है।

अर्जुन सिंह जी का मानना था कि यदि कोई व्यक्ति समाज का नेतृत्व करना चाहता है, तो उसे इतिहास, साहित्य, संविधान, राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज—इन सभी विषयों का निरंतर अध्ययन करते रहना चाहिए।

दूसरी महत्वपूर्ण बात थी—संवेदनशीलता।

वे मानते थे कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का दायित्व भी है।

उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन में अनेक बड़े निर्णय लिए, लेकिन उन निर्णयों के केंद्र में सदैव आम नागरिक रहा।

चाहे आदिवासी समाज हो, किसान हों, मजदूर हों, रिक्शा चालक हों, झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले परिवार हों या शिक्षा से वंचित बच्चे—वे हर निर्णय में अंतिम पंक्ति के व्यक्ति के हित को प्राथमिकता देते थे।

तीसरी बात, जो मुझे सबसे अधिक प्रभावित करती है, वह है—विनम्रता।

इतने बड़े पदों पर रहने के बाद भी उनके व्यवहार में कभी अहंकार दिखाई नहीं दिया।

वे विद्वानों का सम्मान करते थे, कलाकारों से सीखते थे, अधिकारियों की बात सुनते थे और सामान्य नागरिक की समस्या को भी उतनी ही गंभीरता से लेते थे।

यही कारण है कि आज भी उनसे जुड़े लोग उन्हें केवल एक सफल राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि एक संवेदनशील, अध्ययनशील और संस्कारित व्यक्तित्व के रूप में याद करते हैं।

साक्षात्कारकर्ता: सर, आपने अपने लंबे अनुभवों और संस्मरणों के माध्यम से श्री अर्जुन सिंह जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के अनेक ऐसे पक्ष हमारे सामने रखे, जिनके बारे में नई पीढ़ी को बहुत कम जानकारी है।

आपने अपना बहुमूल्य समय दिया और इतने विस्तार से अपने अनुभव साझा किए, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

विजय दत्त श्रीधर: आपका भी धन्यवाद।

मेरा विश्वास है कि इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह नहीं होता, बल्कि उन व्यक्तित्वों की प्रेरणा भी होता है जिन्होंने अपने समय में समाज और देश के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए।

यदि नई पीढ़ी ऐसे व्यक्तित्वों के जीवन का अध्ययन करेगी, तो उसे केवल इतिहास की जानकारी ही नहीं मिलेगी, बल्कि सार्वजनिक जीवन के मूल्यों, संवेदनशीलता, अध्ययन, सेवा और नेतृत्व की भी प्रेरणा मिलेगी।

धन्यवाद।