भारतीय राजनीति में बहुत कम ऐसे राजनेता हुए हैं, जो अपने पीछे इतनी बड़ी विरासत छोड़ गए, जिसे किसी पद से नहीं नापा जा सकता। और ऐसे नेता तो और भी कम हैं, जिनके संसार से विदा होने के वर्षों बाद भी उनके किए काम खुद-ब-खुद उनकी कहानी बयान करते रहते हैं। अर्जुन सिंह जी इस तरह के नेता थे। उनके भू-अधिकार और सामाजिक न्याय के फैसले आज भी अपना असर रखते हैं। इसीलिए अर्जुन सिंह को ऐसे नेता के तौर पर याद किया जाता है जिसने सुविधाओं की नहीं, सिद्धांतों की राजनीति की।
मेरा उनसे बड़ा करीबी रिश्ता रहा। यह रिश्ता कई तरह का था— साथ काम करने वाले व्यक्ति का, वरिष्ठ नेता का और सबसे बढ़कर एक ऐसे करीबी साथी का जिसकी जिंदादिली और अटूट नैतिक शक्ति दूसरों को भी इस बात के लिए प्रेरित करती थी कि सार्वजनिक जीवन में प्रतिबद्धता परम आवश्यक है। अर्जुन सिंह को समझने का अर्थ है सार्वजनिक जीवन में नैतिक गंभीरता को समझना। उनका सीधा मंत्र था— सत्ता को हमेशा समाज के सबसे गरीब व्यक्ति के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।
एक सच्चा जन नेता
अर्जुन सिंह की राजनीतिक शक्ति किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि लोगों के मन की गहरी समझ से आती थी। उनका शासन करने का तरीका कभी जमीन से नहीं कटा। चाहे वह मझोली या सीधी की बात हो या फिर भोपाल और दिल्ली के सत्ता के गलियारे, वह छोटी से छोटी शिकायत के समाधान के लिए उसी गंभीरता से खड़े रहे। मुझे बखूबी याद है कि लोगों के लिए उनकी सहज उपलब्धता सिर्फ सियासी नारा नहीं थी, बल्कि लोगों से जुड़ने की दिली कोशिश थी। वे जिस खुले दिल से मिलते थे, उससे लोगों को लगता था कि उन्हें तवज्जो दी जा रही है और उनकी बात की वजनदारी है। उन्होंने दखल-रहित अभियान से भूमिहीनों और झुग्गीवासियों को जो भू-अधिकार दिए, वह सिर्फ राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि एक नैतिक निर्णय था। उनका मानना था कि स्वाभिमान की शुरुआत स्वामित्व से होती है। जमीन का यह छोटा सा टुकड़ा भूमिहीन को संपत्ति ही नहीं देता, बल्कि पारिवारिक सुरक्षा और आत्मसम्मान भी देता है। ऐसे मामलों में उनका खूब विरोध हुआ लेकिन वे टस से मस नहीं हुए।
संकटकाल में मानवीय चेहरा
नेतृत्व की परीक्षा शांतिकाल में नहीं, संकटकाल में होती है। भोपाल गैस त्रासदी के समय अर्जुन सिंह भारत में हुई सबसे बड़ी दुर्घटना से घिरे हुए थे। मैंने अपनी आंखों से देखा कि उन्होंने प्रशासन को कितनी मुस्तैदी से चलाया और कई बार लालफीताशाही और नियमों को दरकिनार कर पीड़ितों को राहत पहुंचाई। यही मानवीय संवेदना उनके भीतर तब भी काम कर रही थी जब उन्होंने 1983 में फूलन देवी का आत्मसमर्पण करवाया। उनके ऊपर जबरदस्त दबाव था कि वे बल प्रयोग करके दस्यु समस्या का समाधान करें, लेकिन उन्होंने बलप्रयोग की जगह संवाद और गरिमा को वरीयता दी। इसीलिए आत्मसमर्पण का पूरी तरह शांतिपूर्ण होना एक दुर्लभ सफलता थी। इसकी असल वजह यह थी कि अर्जुन सिंह मानते थे कि दुर्दांत से दुर्दांत बागी को भी सम्मान के साथ समाज में लौटने का अवसर दिया जाना चाहिए।
सामाजिक न्याय से कभी समझौता नहीं किया
राजनीतिक नफे-नुकसान की परवाह किए बिना अर्जुन सिंह जिस तरह सामाजिक न्याय की प्रक्रिया पर डटे रहे, वह दृढ़ता आज भी प्रशासन को प्रेरणा देती है और नेतृत्व में नैतिक प्रतिबद्धता के गुण का महत्व बढ़ाती है। मुझे याद आता है कि उस समय वे कितने शांत थे। न तो विरोध प्रदर्शन उन्हें उकसाते थे और न ही समझौते उन्हें ललचाते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि समाज के सभी वर्गों की हिस्सेदारी के बिना शिक्षा अन्यायपूर्ण है। 93वां संविधान संशोधन उनके लिए सिर्फ एक विधान नहीं था, बल्कि यह ऐतिहासिक असंतुलन को सुधारने की एक पहल थी। नीतिगत ही नहीं, बल्कि निजी तौर पर भी उन्होंने वंचित समुदाय के छात्रों के हित के लिए बहुत से कदम उठाए। कईयों को तो यह भी पता नहीं होता था कि उन्हें मिल रही मदद के पीछे अर्जुन सिंह का हाथ है। असल में ईमानदार नेतृत्व का सच्चा गुण भी यही है।
दूरदृष्टा प्रशासक
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर अर्जुन सिंह ने हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि विकास संतुलित होना चाहिए— उद्योग लगें, लेकिन शोषण न हो; प्रगति हो, लेकिन विस्थापन न हो। उन्होंने राज्य स्तरीय औद्योगिक फाइनेंसिंग को मजबूत किया, नए औद्योगिक क्षेत्र बनाने को प्रोत्साहित किया, लेकिन साथ ही आदिवासियों के भू-अधिकारों के प्रति पूरी तरह संवेदनशील बने रहे। मुझे कैबिनेट में हुई कई ऐसी बातचीत याद हैं जब उन्होंने कहा कि आदिवासी कल्याण के सवाल पर कोई समझौता नहीं हो सकता। सड़क, बिजली और सिंचाई जनता पर अहसान नहीं है, बल्कि यह न्याय देने के तरीके हैं। इनके जरिए दूरदराज के आदिवासी इलाके न सिर्फ बुनियादी ढांचे से जुड़ते हैं, बल्कि उनके लिए संभावना के द्वार खोलते हैं। उन्होंने कृषि क्षेत्र में फसल विविधीकरण और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की हिमायत तब शुरू कर दी थी, जब बहुत से लोगों ने यह शब्द सुने भी नहीं थे। उनकी दृष्टि साफ थी— किसान को एक फसल या एक सीजन का मोहताज नहीं रहना चाहिए।
मध्य प्रदेश में सांस्कृतिक पुनर्जागरण
सांस्कृतिक क्षेत्र में अर्जुन सिंह का योगदान लाजवाब है। सन 1982 में मशहूर आर्किटेक्ट चार्ल्स कोरिया से भारत भवन का निर्माण कराकर अर्जुन सिंह ने साफ संदेश दिया— संस्कृति आभूषण नहीं, पहचान है। उन्होंने कलाकारों, लेखकों और मध्य प्रदेश की लोक परंपराओं के संरक्षण और प्रोत्साहन में निजी तौर पर दिलचस्पी दिखाई। प्रदेश में आने वाले मेहमानों को सिर्फ फाइल और फैक्ट्रियां ही नहीं दिखाई जाती थीं, उन्हें आदिवासी कला, कविता और संगीत से भी रूबरू कराया जाता था। उनका मानना था कि संस्कृति सत्ता को शालीन बनाती है।
मेरे व्यक्तिगत संबंध
अर्जुन सिंह के उत्साहवर्धन के बिना मेरी राजनीतिक यात्रा का बयान नहीं किया जा सकता। मुझे अच्छी तरह याद है कि अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ने से पहले मैं काफी हिचक रहा था। लेकिन उन्होंने बड़े भरोसे के साथ मुझसे कहा, “मैंने इंदिराजी से बात कर ली है। आपको चुनाव लड़ना चाहिए।” उनके इस भरोसे ने मेरे सार्वजनिक जीवन का रुख मोड़ दिया। मेरा और उनका रिश्ता राजनीतिक क्षितिज से कहीं व्यापक है। दशकों तक राजनीति में हमने साथ मिलकर काम किया और हमारे परिवारों के बीच मधुर संबंध बन गए थे।
जैसा कि अक्सर लंबे राजनीतिक रिश्तों में होता है, हमारे बीच भी कई बार मतभेद पैदा हुए। लेकिन मतभेद ने एक-दूसरे के प्रति सम्मान को कम नहीं होने दिया। वे ऐसे नेता थे जो दूसरे को खारिज किए बिना असहमत हो सकते थे। यह एक ऐसा गुण है जो आज की राजनीति में मुश्किल से मिलता है।
मंत्री के पीछे का मनुष्य
अपने गंभीर बाहरी व्यक्तित्व के पीछे एक सहृदय अर्जुन सिंह छिपे रहते थे। उनके हाथ से लिखे नोट्स पढ़ेंगे तो पाएंगे कि उनके पीछे एक विचारशील मस्तिष्क काम कर रहा है, जो स्पष्टता और sincerity की कद्र करता है। उनका मजाक भी बड़ा सौम्य होता था और अक्सर वे खुद का ही मजाक उड़ाते थे। उनका दाऊ-छवि वाला व्यक्तित्व अधिकारबोध को तो निरूपित करता था, लेकिन साथ ही एक गर्मजोशी हमेशा वहां मौजूद रहती थी। अपनी बात पर दूसरों का ध्यान खींचने के लिए उन्हें कभी ऊंची आवाज में बात करने की जरूरत नहीं पड़ी। यह इस बात का द्योतक है कि सच्ची ताकत आवाज की ऊंचाई में नहीं, इरादे की गहराई में मौजूद होती है।
अनमोल विरासत
अर्जुन सिंह नेताओं की उस पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं जो राजनीति को साध्य नहीं, साधन मानती थी। उनकी विरासत वैसे तो उन संस्थानों, नीतियों और उनके बनाए नेताओं के रूप में मौजूद है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी विरासत यह है कि लोग उन पर किस कदर भरोसा करते थे। उनका स्मरण करते समय हमें यह याद रखना चाहिए कि हर हाल में सत्ता का एक नैतिक केंद्र होना चाहिए। इस तरह के साहस में कई बार आपको अकेले खड़ा रहना पड़ेगा। नेतृत्व का सही माप यह नहीं है कि आपके लिए कितने लोग तालियां बजाते हैं, बल्कि यह कि कितने लोगों पर आपका असर पड़ता है। अर्जुन सिंह ने ऐसा ही असर अपने वक्त और समाज पर डाला। इसीलिए अर्जुन सिंह एक सच्चे जन नेता बने और इतिहास उन्हें इसी रूप में याद करेगा।