एक पुत्री की नजर में पिता श्री अर्जुन सिंह -

 

पिता के ऊपर संस्मरण लिखना किसी भी बेटी के लिए अत्यंत कठिन कार्य होता है। क्योंकि उसकी जिम्मेदारी सच्चाईकहने की और भी बढ़ जाती है। सार्वजनिक जीवन में कई ऐसी बातें होती हैं जो ना कहीं जा सकती हैं और नहीं कहीं जातीहैं ।

श्री अर्जुन सिंह मेरे लिए केवल पिता ही नहीं थे वे मेरे आदर्श, मेरे मार्गदर्शक और मेरे सबसे बड़े संबल थे । मार्च 2011 मेंजब वे हमसे बिछड़ गए, तब जीवन के हर क्षेत्र से लोग श्रद्धांजलि देने आए। तब मुझे उनके विशाल व्यक्तित्व को एकबेटी के रूप में और गहराई से समझने का अवसर मिला।

वे कांग्रेस के समर्पित सिपाही थे। उनकी निष्ठा जनता विशेषकर गरीबों और वंचितों के प्रति थी इसलिए उन्हें "गरीबों कामसीहा" कहा गया। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते उन्होंने "सर्वहारा" शब्द को लोकप्रिय किया। एक बेटी होने के नातेमुझे गर्व होता है कि मेरे पिता ने सत्ता को सेवा का पर्याय बना दिया।

मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़ा एक प्रसंग आज भी प्रेरणा देता है। कठिनाई में फंसे व्यक्ति की फाइल पर वे लिखते थे"कृपया सभी नियमों में यथासंभव शिथिलता बरतें और इस व्यक्ति का कार्य करने का मार्ग निकालें ।"उनके लिए कानूनसे पहले इंसानियत थी। यही करुणा उन्होंने हमें भी सिखाई।

घर में भी बिल्कुल अलग थे। सख्त भी और बहुत स्नेहिल भी। उन्होंने कभी हम बच्चों को गलतियों पर कठोर दंड नहींदिया उनका धैर्य बेमिसाल था। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी वे घर आकर हमारे साथ शांत मन से भोजन करते औरहमारी पढ़ाई के बारे में पूछते तब आश्चर्य होता था कि इतना मानसिक बल वे कहां से लाते हैं। शिवराजपुर  सांडा स्थितहमारे पैतृक घर के दरवाजे पर लगी पट्टीका -"हम वह हमारा घर परमात्मा और उसकी प्राणियों की सेवा हेतु सदैव तत्परहै"-  बचपन से ही इसे पढ़ते-पढ़ते सेवा -भाव हमारे भीतर रच बस गया।

मुझे उनकी एक बात से बहुत झुंझलाहट होती थी कि वे किसी भी व्यक्ति की प्रति उसकी बड़ी से बड़ी गलती के बावजूदप्रतिशोध की भावना नहीं रखते थे। यदि कोई अपनी गलती स्वीकार कर लेता था तो वे उसे एक और अवसर अवश्य देतेथे। कई बार मैंने उनसे कहा "दाऊ इस व्यक्ति ने आपको बहुत निराश किया है दुख पहुंचा है फिर भी आप इसे अपने पासरखे हुए हैं।" मेरे विचार से यह  उनकी एक कमजोरी थी। इसी स्वभाव के कारण उन्होंने जीवन में बहुत कष्ट सहे। उनकेव्यक्तिगत जीवन की सबसे बड़ी पीड़ा यही रही कि अनेक लोगों ने उनकी सरलता और क्षमाशीलता का लाभ उठाया तथाउनके विश्वास को तोड़ा।

उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह बहुत कम बोलते थे और दूसरों को सुनते ज्यादा। कई बार लोगउनके मौन के कारण को ठीक से समझ ही नहीं पाते थे और गलत अवधारणा बना लेते थे हालांकि उनका संक्षिप्त उत्तरसुनने के बाद लोगों की धारणा बदल जाती और वे शर्मिंदा होते।

मुख्यमंत्री का पद किसी भी व्यक्ति को शक्ति देता है लेकिन उसके साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होती है मैंने उन्हें उसेजिम्मेदारी के साथ जीते हुए देखा। उनके लिए देश केवल नक्शे पर बनी सीमाओं का नाम नहीं था। वे अलग-अलग क्षेत्र, अलग-अलग सामाजिक समूह और अलग-अलग परिस्थितियों से आने वाले लोगों के बारे में सोचते थे। उनके राजनीतिकजीवन को समझने वाले लोग उनके निर्णय, उनकी प्रशासनिक शैली और उनकी राजनीतिक समझ पर आज तक चर्चाकरते हैं। लेकिन घर में हमें यह दिखाई देता था कि किसी बड़े पद के साथ जीवन कितना व्यस्त और कितना अनुशासितहो जाता है। कभी-कभी बेटी के मन में यह भी आता था कि काश पिता के पास हमारे लिए थोड़ा और समय होता लेकिनशायद बड़े सार्वजनिक जीवन का यही सबसे कठिन पक्ष है जिस पिता को परिवार अपने पास चाहता है, उन्हें जनता केलिए समर्पित होना पड़ता है।

उनके मन में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था। धर्म, संप्रदाय, जाति, अमीर- गरीब सभी- समान। इसका एक उदाहरणआज भी याद है। जब दाऊ मुख्यमंत्री थे हम सब राजकीय विमान से हवाई यात्रा कर रहे थे। विमान उड़ाने वाला था किएक व्यक्ति स्कूटर से उतरकर बेहताशा हवाई पट्टी की तरफ भागते हुए दाऊ से मिलने दौड़ा। दाऊ ने पायलट से कहा जरारुकिए मुझे इस व्यक्ति से मिलना है, मां ने कहा आप किसी के लिए विमान रुकवाएंगे ? दाऊ बोले तुम उस जरूरतमंदआदमी की भावनाओं को नहीं समझ पा रही हो। वे उतरकर मिले। उस दिन हम सबका सिर सम्मान से झुक गया।

वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे। गुरु मोनी बाबा और मदर टेरेसा से उन्हें प्रेरणा मिली। उच्च शिक्षा को बढ़ावा देना IIT और IIM की स्थापना देश को उनकी सबसे बड़ी देन है उन दिनों मैं उन्हें केवल मंत्री के रूप में नहीं देखी थी मैं यह भीदेखती थी कि शिक्षा को लेकर उनका दृष्टिकोण कितना व्यापक था। शिक्षा उनके लिए केवल डिग्री प्राप्त करने कामाध्यम नहीं थी, शिक्षा व्यक्ति को अपने पैरों पर खड़ा करने और समाज को आगे ले जाने की शक्ति देती है। यह सोचउनके सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। आज पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है कि पिता के जीवन मेंराजनीति केवल सत्ता का माध्यम नहीं थी वह उनके लिए समाज और देश के साथ जुड़ने का माध्यम भी थी।

डॉ करण सिंह उन्हें " आदर्शों पर अडिग" मित्र मानते थे। इस यात्रा में मेरी मां उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी। 13 और 18 की उम्र में शुरू हुई उनकी साझेदारी जीवन भर विश्वास और त्याग की मिसाल रही। मां ने भी हर परिस्थिति में उनका पूरासाथ दिया।

कुलीन परिवार में जन्म लेने के बावजूद उनका हृदय अत्यंत सरल और सहज था। उन्हें विदा हुए 15 वर्ष हो चुके हैं, परआज भी वह मेरे जीवन के सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत हैं।

पिता ने मुझे सिखाया पद से बड़ा काम होता है और काम से बढ़कर होती है इंसानियत। यह मेरी सबसे बड़ी धरोहर है।

अगस्त 2016 में अर्जुन सिंह सद्भावना फाउंडेशन द्वारा उनके विचारों की पुस्तक का विमोचन हुआ आज इस पोर्टल केमाध्यम से मैं एक बेटी होने के नाते इस विरासत को आप सब तक पहुंचाना चाहती हूं।

 

मां के शब्दों में -

मेरे पति और मैने जीवन के 64 बसंत और जिंदगी में आते उतार -चढ़ाव एक साथ मिलकर देखें। हम एक दूसरे की शक्तिप्रेरणा स्रोत भी रहे हैं।

मेरे विवाह के उपरांत मेरे जीवन का केंद्र बिंदु मेरे पति ही रहे। मैं उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती रही। उनकेस्वर्गवास के बाद  मैं चाहते हुए भी उनकी याद में और उनके आदर्शों को आगे बढ़ाने में ज्यादा कुछ कर नहीं पाईक्योंकि मुझे इस सदमे से उभरने में 5 साल लगे।

अब मैने अपने परिवार के साथ मिलकर उनके आदर्श और उनके मूल्यों को आगे बढ़ाने के प्रयास में दृढ़ संकल्प होकर"सद्भावना फाउंडेशन" की स्थापना की है।

आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप लोगों का इस फाउंडेशन में योगदान और सहयोग बना रहेगा।