वो तो अर्जुन ही थे
भगवान सिंह (पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं स्नेहिल राजनीतिक छात्र)
प्रदेश की राजनीति से केन्द्र की राजनीति तक अपना दबदबा रखने वाले पूर्व केन्द्रीय एवं मुख्यमंत्री रहे स्व. श्री अर्जुन सिंह वास्तव में अर्जुन ही थे, जो राजनीति में अपने धुर विरोधियों को भी अपनी राजनीतिक धनुर्विद्या से कायल कर देते थे और इसके चलते वह तत्कालीन समालोचकों का मुंह बंद कर देते थे। उनके जीवन में सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय की स्थिति हमेशा परिलक्षित होती रही। फिर चाहे उनके ऊपर ही कोई विपदा आन खड़ी न हो जाए और वह जीवन पर्यंत तक इसका अनुशरण करते रहे।
हालांकि काल के गाल में समाने से कोई श्रद्धेय स्व. श्री अर्जुन सिंह जी नहीं बचता है, लेकिन अपने जीवन में स्व. श्री अर्जुन सिंह के क्रियाकलापों ने उनको मरने के बाद भी जीवन जीने वालों की श्रेणी में ला खड़ा किया है। जिसका कारण उनके द्वारा दलित-शोषित वर्ग के साथ उन लोगों को भी अपने शासनकाल में मुख्यधारा में लाने का काम किया था, जिनकी जिंदगी जंगलों-बीहड़ों की आदी हो गई थी और उनके जीवन में दर्द का अंत मौत के अलावा नहीं हो सकता था।
हालांकि लोगों ने उनके निजी और राजनीतिक जीवन पर सार्वजनिक रूप से लांछन लगाने का काम किया था, मगर उनके द्वारा कभी सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। साइंस कॉलेज से M.Sc. पास करने के बाद मैं स्व. श्री अर्जुन सिंह के सानिध्य में आया और उनके जीवन के अन्तिम क्षणों तक 48 वर्षों तक उनके सहयोग से कांग्रेस के साथ सरकार में विभिन्न पदों पर कार्यरत रहा।
जिसको पकड़ा उसको छोड़ा नहीं
स्व. श्री अर्जुन सिंह के जीवन का सबसे बड़ा फलसफा (विचारधारा) थी कि उन्होंने जिसको भी पकड़ा उसको पूरे जीवन में छोड़ा नहीं था और अपनी राजनीतिक विरासत को बढ़ाने अपने ऊपर भरोसा रखने वालों को बेहतर अवसर ही नहीं मुहैया कराए, बल्कि उनके जीवन में बड़े परिवर्तन तक कर दिए। जिसके उदाहरण पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह सहित कई अन्य कांग्रेसी कार्यकर्ता एवं पदाधिकारी हैं, जो आज भी कांग्रेस में सक्रिय होकर स्व. श्री अर्जुन सिंह के बताए मार्ग पर चल रहे हैं।
कांग्रेस के प्रति निष्ठा और सबका सम्मान
अपने राजनीतिक जीवन में स्व. श्री अर्जुन सिंह की निष्ठा कभी कांग्रेस के लिए कम नहीं हुई और न ही उनके द्वारा कांग्रेसी विचारधारा को छोड़ किसी अन्य विचारधारा से प्रेरित होने की स्थिति दिखी। बल्कि उनके द्वारा कांग्रेसी विचारधारा को आत्मसात करते हुए सबका सम्मान करने की अपनी नीति को इतना विकसित कर लिया कि उनके समय में समकालीन नेताओं की फेहरिस्त में वह धीरे से सबसे ऊंचे नजर आने लगे और प्रदेश सहित देश भर में वह एक परोपकारी राजनीतिज्ञ की स्थिति में पहुंच गए थे।
धार्मिकता में भी बढ़-चढ़कर रहे जीवन में
स्व. श्री अर्जुन सिंह ने अपने जीवन में धार्मिकता का मार्ग नहीं छोड़ा था। मगर राजनीतिक जीवन में अब जिस प्रकार से इसका पाखंड किया जा रहा है, वह इसके उलट राजनीति से सिर्फ धर्म की सेवा करने की स्थिति में नजर आते रहे हैं। वहीं स्व. श्री अर्जुन सिंह अपने जीवन में धार्मिक एवं सामाजिकता का बंधन कभी तोड़ते नजर नहीं आए और उनका भरसक प्रयास रहा था कि वह लोग धर्म को धर्म तक ही सीमित होकर धर्मांधता से बचते रहें।
चित्र विवरण: 01.04.1981 को मान. मुख्यमंत्री श्री अर्जुनसिंह जी उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सरोजसिंह और भगवान सिंह यादव जैन वार्षिक तीर्थ सोनागिर (तीर्थ क्षेत्र)।
परिवार के प्रति दायित्व किया पूरा
स्व. श्री अर्जुन सिंह ने जिस तरह से अपने राजनीतिक जीवन को जिया था और उसी तरह से अपने पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन भी बखूबी किया और इसके लिए उनकी जीवन संगिनी रहीं स्व. श्रीमती सरोज कुमारी से उनका तालमेल देखने लायक था। जिसके बल पर इतने व्यस्त रहते हुए भी उनके द्वारा अपने पारिवारिक जीवन की कठिनाइयों को न सिर्फ पार किया, बल्कि अपने परिवार के प्रति अपने दायित्वों को पूरी तरह निभाया। जिसके चलते उनके परिवार में आज भी उनकी छवि बेहद संजीदा और निश्छल पुरुष की है।
चित्र विवरण: खड़े हुए मान. श्री अर्जुनसिंह जी एवं मान. श्रीमती सरोजसिंह जी, बैठे हुए श्री अजयसिंह राहुल जी (पुत्र), श्रीमती वीणा सिंह जी (पुत्रवधू) एवं श्री अभिमन्यु सिंह जी (पुत्र)।
सार्वजनिक एवं राजनीतिक जीवन का विवरण
वर्ष 1953 में रीवा दरबार कॉलेज यूनियन के अध्यक्ष, 30 सितंबर 1963 में राज्य मंत्री कृषि एवं सामान्य प्रशासन तथा सूचना प्रसारण विभाग, वर्ष 1964 मास्को में आयोजित विश्व युवक सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि मण्डल के उपनेता। वर्ष 1965 में संयुक्त राज्य अमेरिका में मध्यप्रदेश कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु यात्रा। जून 1967 से 30 जुलाई 1967 तक योजना तथा विकास मंत्री, वर्ष 1969 में संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधि मण्डल के सदस्य। 15 अगस्त 1972 से दिसंबर 1975 तक शिक्षा मंत्री, 1977 में चुनाव जीतकर मध्य प्रदेश विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता एवं लोक लेखा समिति के सभापति। जनता शासन काल में हुए आंदोलनों में जेल यात्राएं। 1980 के चुनाव में सर्वसम्मति से 9 जून 1980 को प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रथम बार बने। 1985 में दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद पंजाब में राज्यपाल नियुक्त किया गया। 1985 में केन्द्रीय वाणिज्य मंत्री, 1985 में लोकसभा सदस्य, 1986 में अ.भा. कांग्रेस कमेटी उपाध्यक्ष, 1986 में केन्द्रीय संचार मंत्री, 1989 में प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष, 1990 में विधानसभा सदस्य निर्वाचित, 1991 में दसवीं लोकसभा तथा अप्रैल 2000 और मार्च 2006 में राज्यसभा सदस्य के लिए चुने गए। जून 1991 से 1994 एवं मई 2004 से 2009 तक दो बार भारत सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री रहे।
राजनीतिक जीवन में उनके द्वारा किए गए जनहित के कार्य
मध्य प्रदेश में तेंदू पत्ता नीति बनाकर आदिवासियों के जीवन उन्नयन का कार्य।
गरीबों के लिए एकलबत्ती कनेक्शन योजना शुरुआत 14 अगस्त 1984 को।
मप्र में झुग्गी झोपड़ी में रहने वालों के लिए आवास नीति के तहत पट्टे दिलाने का कार्य तत्कालीन विधायक श्री पी.सी. शर्मा के संरक्षण तथा संस्थाओं के अध्यक्ष स्व. श्री ईश्वर सिंह चौहान के अनुरोध पर किया।
दस्यु समस्या के उन्मूलन के लिए 12 फरवरी 1983 को डकैत फूलन देवी और घनश्याम बाबा आदि को आत्मसमर्पण कराकर मुख्य धारा में लाने का कार्य।
प्रदेश सहकारिता को बचाने के लिए सुंदरलाल पटवा सरकार में निरस्त की गई सहकारी संस्थाओं को बहाल कराने का कार्य मान. श्री अर्जुन सिंह के निर्देशन में स्व. श्री सुभाष यादव, श्री भगवानसिंह यादव एवं श्री राधेश्याम शर्मा के आग्रह पर उच्चतम न्यायालय नई दिल्ली के आदेश से सभी सहकारी संस्थाओं को बहाल कराया गया।
प्रदेश में आयुर्वेद और होम्योपैथी के चिकित्सकों के उत्थान हेतु एलोपैथी चिकित्सकों के समकक्ष वेतन देने का कार्य प्रान्ताध्यक्ष डॉ. श्री बृजमोहन मौर्य के अनुरोध पर।
चित्र विवरण: मान. अर्जुन सिंह एवं डकैत फूलन देवी।
चित्रकूट में कराए काम
चुरहट का पुल एवं कोठी के आगे सतना वाली रोड पर पुल को दी गयी जमीन एवं निर्माण।
कामदगिरी परिक्रमा मार्ग का चौड़ीकरण करने, काम बिना पर्वत के पत्थर कराने के लिए आंदोलन कर तत्कालीन सरकार को विवश किया। जिसका कारण कामदगिरी पर्वत की शिलाओं को उनके द्वारा पवित्र मानना था।
रामायण के महत्व को जन-जन तक पहुंचाने के लिए राष्ट्रीय रामायण मेला, कर्वी उ.प्र. का उद्घाटन एवं स्टेज को व्यवस्थित करने हेतु मानव संसाधन मंत्री श्री अर्जुन सिंह जी ने 10 लाख रुपए की राशि 21 फरवरी 1993 को उपलब्ध करवाई।
राजीव लोंगोवाल समझौता के लिए त्यागा मुख्यमंत्री पद
80 के दशक में पंजाब में फैल रही उग्रवादी समस्या को सुलझाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कहने पर 14 मार्च 1985 को दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद स्व. श्री अर्जुन सिंह ने त्यागपत्र देते हुए पंजाब राज्यपाल का पद ग्रहण करने के बाद चंडीगढ़ में माननीय राजीव गांधी और अकाली नेता हरचंद सिंह लोंगोवाल के मध्य समझौता कराकर पंजाब में पनप रहे उग्रवाद पर करारा प्रहार किया था।
चंडीगढ़ में राज्यपाल के रूप में शपथग्रहण लेने के बाद मान. श्री अर्जुनसिंह जी के साथ गये उनके पुत्र श्री अभिमन्युसिंह एवं श्री अजयसिंह (राहुल) जी एवं उनके कृपापात्र सहयोगी श्री भगवानसिंह यादव।
कांग्रेस बचाने वापस करवाया टिकट
वर्ष 1985 के चुनावों में तत्कालीन लश्कर पश्चिम विधानसभा सीट से मुझे प्रत्याशी बनाया गया था। उस समय किसी राजनीतिक कारण के चलते मुझसे टिकट वापसी के लिए तत्कालीन समय में स्व. राजीव गांधी के कहने पर स्व. श्री अर्जुन सिंह ने टिकट वापस करने को कहा तो मैंने सहर्ष उसको वापस कर दिया था। जिसकी वजह कांग्रेस के अंदर किसी तरह की कलह से कांग्रेस को नुकसान होने की स्थिति थी।
स्व. श्री अर्जुन सिंह हमेशा कर्त्तव्यशीलता का उदाहरण रहे थे और आज भी हैं।
कांग्रेस के प्रति उनकी निष्ठा पूरी तरह समर्पित एक कार्यकर्ता की थी और उनके जीवनकाल में कांग्रेस का परचम हमेशा फहराता रहा था। जिसका कारण उनके द्वारा हर समय कांग्रेस के लिए चिंतन और मनन करने के अलावा देश व प्रदेश की आम जनता के जीवन में बेहतरीन उत्थान लाने की उनकी मनोदशा का होना था। जिसके लिए वह दलगत राजनीति से उठकर भी कार्य करने से पीछे नहीं हटते थे।
जिसके चलते वर्तमान राजनीति में उनके जैसा व्यक्तित्व बना पाना बेहद मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है। जिसके चलते यह कहना भी ज्यादा नहीं है कि स्व. श्री अर्जुन सिंह अपने नाम के अनुरूप अर्जुन ही थे जो दुनिया से विलीन होने के बाद भी अपने अस्तित्व का बोध अपने कार्यों से करा रहे हैं।
चित्र विवरण: 9 मई 1988 को ग्वा. में आयोजित ग्वा.-चम्बल संभाग का सहकारी किसान सम्मेलन में मान. मुख्यमंत्री श्री अर्जुनसिंह जी, अ.भा. कांग्रेस कमेटी के महासचिव श्री चंदूलाल चन्द्राकर, भगवानसिंह यादव।
चित्र विवरण: 12 दिसम्बर 1986 को मान. मुख्यमंत्री श्री अर्जुनसिंह एवं भगवानसिंह यादव मुरैना जिले के परसा में आयोजित चम्बल संभाग के किसान सम्मेलन में किसानों की समस्या के बारे में ज्ञापन लेते हुए।
म.प्र. के चित्रकूट धाम एवं उत्तर प्रदेश सरकार से समन्वय बनाकर श्री अर्जुन सिंह जी ने मुक्ति क्षेत्र घोषित कराने का बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया।
उक्त सभी जनहित के कार्यों के लिये भगवान कामतानाथ जी की कृपा, स्वामी संत रणछोड़दास जी महाराज का आशीर्वाद, आचार्य राजगुरू शंकरशरण प्रसन्नाचार्य, पुरानी लंका के जगतगुरू रोहिणी प्रपन्नाचार्य की शुभकामनाओं से तथा स्व. श्री तेजभान सिंह चौबे, डॉ. वी.के. जैन (पदमश्री प्राप्त), श्री हेमराज सिंह चौबे (नन्ने भईया), स्व. श्री नाथूराम गुप्ता, पार्षद स्व. श्री सियाराम दास, स्व. श्री रघुवीर प्रसाद यादव, स्व. श्री गौरीशंकर गर्ग, श्री श्यामलाल यादव (पप्पू), स्व. श्री गोपाल कृष्ण करवरिया, स्व. सज्जन गर्ग, स्व. श्री रसिक बिहारी मिश्रा, स्व. श्री द्वारकेष पटेरिया (कवि), स्व. रामचन्द पाण्डेय, स्व. डॉ. अच्छेलाल तथा श्री मुन्ना यादव के अनुरोध पर माननीय श्री श्रद्धेय अर्जुन सिंह जी ने उक्त सभी कार्य सम्पन्न करवाये।
(भगवान सिंह यादव)
पूर्व मंत्री म.प्र. शासन